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दावा : देश के बंटवारे से नाखुश होकर नेता जी ने बिताई गुमनाम ज़िन्दगी और कहलाये गुमनामी बाबा

अयोध्या के ब्रह्मकुंड गुरुद्वारा,लखनौवा हाता और छोटी देवकाली मंदिर के करीब कई वर्षों तक रहे गुमनामी बाबा

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Untold Story Og Gumnami Baba and Neta Ji Subhash chandra bose

Gumnami Baba

अयोध्या : धार्मिक नगरी अयोध्या से भी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के जीवन काल की कई अहम् यादें जुडी हुई है हालांकि जब तक तस्वीर साफ़ नहीं होती तब तक ये रहस्य बना हुआ है कि अयोध्या और फैजाबाद में रहने वाले गुमनामी बाबा ही नेता सुभाष चन्द्र बोस थे . लेकिन उस दौर में गुमनामी बाबा ने जिन स्थानों को अपना ठिकाना बनाया वो स्थान आज भी अयोध्या में मौजूद हैं और गुमनामी बाबा की यादों से जुड़े हुए स्थान के रूप में जाना जाता है . .नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक बंगाली परिवार में हुआ था, उसके बाद उनके पालन पोषण के बाद पढाई के लिए उन्हें विदेश भेज दिया गया तथा 1921 में भारत में बढ़ती राजनीतिक गतिविधियों का समाचार पाकर बोस शीघ्र भारत लौट आए. सिविल सर्विस छोड़ने के बाद वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़ गए और सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया . इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था। नेताजी अपनी आजाद हिंद फौज के साथ 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुँचे. यहीं पर उन्होंने अपना प्रसिद्ध नारा, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा" दिया. 18 अगस्त 1945 को टोक्यो जाते समय ताइवान के पास हवाई दुर्घटना हुई , लेकिन उसमे नेता जी का शव नहीं मिल पाया गया . तब से नेताजी की मौत के कारणों पर आज भी विवाद बना हुआ है.

अयोध्या के ब्रह्मकुंड गुरुद्वारा,लखनौवा हाता और छोटी देवकाली मंदिर के करीब कई वर्षों तक रहे गुमनामी बाबा

अयोध्या में रहने वाले कुछ लोग भी यह मानते है कि नेता जी छिपकर अयोध्या में गुमनामी बाबा के रूप मे रहते थे अयोध्या में गुमनामी बाबा की कहानी 1975 से शुरू हुआ और अयोध्या में कई स्थानों पर उन्होंने अपना ठिकाना बनाया . गुमनामी बाबा अयोध्या के स्व. राम किशोर पंडा के घर में भी रहे , स्व. राम किशोर पंडा के पुत्र नन्द किशोर मिश्र ने बताया कि गुमनामी बाबा के रूप में 1975 में बस्ती से अयोध्या आए थे और हमारे मकान में ढाई वर्ष तक रहे है इसके बाद वो अपना स्थान बदल कर ब्रम्ह्कुन्ड गुरुद्वारा में रहने लगे थे जहाँ पर 3 वर्ष बिताया तथा फिर छोटी देवकाली रोड पर स्थित लखनऊवा हाता में 2 वर्ष से अधिक बिताया .आखिरी समय में गुमनामी बाबा फैजाबाद के राम भवन में पिछवाड़े में बने दो कमरे के मकान में रहते थे जहाँ उनकी मृत्यु हुई . श्री मिश्र का दावा है गुमनामी बाबा और कोई नहीं नेता जी ही थे क्यों की हमारा उनका साक्षात्कार भी हुआ है हमारे पूरे परिवार के लोगो ने उनकी सेवा की है .एक समझौते के आधार वह छुपकर रहते थे जिस से देश आजाद होने के बाद देश में अमन चयन कायम रहे और संविधान का पालन होता रहे .नेता जी को सबसे बड़ा कष्ट पाकिस्तान और भारत के बंटवारे का था जिसका वह बहुत विरोध करते रहे और इसी बात से आहत होकर उन्होंने अपने जीवंन को परदे के पीछे कर लिया और अपने को गुम रखा जिससे वह गुमनामी बाबा के नाम से ही प्रसिद्ध हुए .