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कैसी थी अयोध्या की संस्कृति और कहां तक है अयोध्या की सांस्कृतिक बाउंड्री?

Ram Mandir Katha: आज अध्याय-2 में हम आपको राम और उनकी सांस्कृतिक विरासत के बारे में बताएंगे। आज हम भगवान श्रीराम की अयोध्या से नेपाल तक की यात्रा को जानेंगे। साथ ही अयोध्या की सांस्कृतिक सीमाओं की भी चर्चा करेंगे।

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Ram Mandir Katha: हमने जनौरा गांव के बारे में जानकारी हासिल कर लिया। यह वही गांव है, जहां राजा जनक अयोध्या आने पर निवास करते थे और इस गांव को उन्होंने राजा दशरथ से खरीद लिया था। आज भी इस गांव में गिरिजा कुंड, मंत्रेश्वर महादेव और श्रीसरोवर मौजूद है।

संस्कृति क्या है?
अयोध्या की सांस्कृतिक सीमाओं को जानने से पहले अच्छा होगा कि हम संस्कृति के बारे में थोड़ी चर्चा कर लें। वास्तव में संस्कृति किसी भी समाज की परंपराएं, लोकव्यवहार और जीवन शैली का सम्मिलित रूप होती है। दिग्विजय नाथ पीजी कॉलेज, गोरखपुर के प्राचार्य डॉ ओपी सिंह कहते हैं कि संस्कृति किसी समुदाय की परंपरा, मूल्यबोध और आचार संहिता का समुच्चय होती है। जब हमने सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के शोध छात्र रहे संत आदित्य आनंद से इस बारे में जानना चाहा तो उन्होंने कहा कि संस्कृति किसी भी समाज का मेरुदंड होती है।

परिब्राजक संयासी स्वामी विवेकानंद के शब्दों में कहे तो संस्कृति वैदिक संस्कृति भारत की आत्मा है। यहां की आध्यात्मिकता ही भारत की आत्मा है। भारत का प्रत्येक कार्य उसी आध्यात्मिकता से प्रेरित है, जिसका उद्देश्य मनुष्य निर्माण और उसके चरित्र का निर्माण है। इसे ही दूसरे शब्दों में संस्कृति कहते हैं।

अयोध्या की संस्कृति ही भारत की संस्कृति है। विशाल देश में भाषा, रहन-सहन, पूजा और आध्यात्म के बाहरी आवरण अलग हो सकते हैं लेकिन सभी की एकअंर्तधारा एक ही है। इसी क्रम में हमे अयोध्या और मिथिला की संस्कृति के संगम को भी समझना होगा।

अयोध्या और मिथिला की संस्कृति का संगम
भगवान श्रीराम और लक्ष्मण की जनकपुर यात्रा ने दोनों संस्कृतियों के संगम का कार्य किया। अयोध्या और मिथिला राज्यों के बीच के क्षेत्र में कुसंस्कृति का विनाश भी हुआ। महर्षि विश्वामित्र के साथ श्रीराम और लक्ष्मण आतताई शक्तियों के वध के लिए गए थे। इसे लेकर संस्कृत के शोध छात्र रहे आदित्य आनंद कहते हैं कि राक्षसी या आतताई शक्तियां ही थीं जिनका विनाश हुआ। ये शक्तियां संस्कृति को प्रदूषित कर रही थीं। आप इसे ऐसे भी कह सकते हैं।

हमने जब अयोध्या के संत और कथावाचक आचार्य राजेश ठाकुर से बात किया तो वे कहते हैं कि
भगवान राम उत्तरप्रदेश की अयोध्या से अंबेदकरनगर, आजमगढ़, मऊ, गाजीपुर, बलिया पहुंचे। यहां से गंगा नदी पारकरके बिहार के बक्सर, पटना, वैशाली, हाजीपुर, दरभंगा, मधुबनी, पूर्वी चंपारण होते हुए नेपाल के जनकपुर पहुंचे थे। जनकपुर में भगवान शिव के पिनाक धनुष को भंग करके जनक की प्रतिज्ञा पूरी की और सीता का पाणिग्रहण किया था।

जहं-जहं चरण पड़े रघुवर के…
भगवान श्रीराम पर शोध करने वाले श्रीराम सांस्कृति शोध संस्थान न्यास के डॉ रामअवतार शर्मा की पुस्तक जहं-जहं चरण पड़े रघुवर के में विस्तार से श्रीराम की यात्राओं का उल्लेख किया गया है। वह लिखते हैं कि अयोध्या से 25 किमी दूर श्रृंगी ऋषि का आश्रम था, जहां पर राम ने बला और अतिबला की शिक्षा पाई थी। गाजीपुर में सिदागर घाट पर ऋषियों से मुलाकात किया और बलिया जिले में सरयू तट पर स्थित बैजल लखनेश्वर डीह में लक्ष्मण ने भगवान शिव की स्थापना किया। कुछ दूरी पर ही गंगा-सरयू संगम तट पर पहुंचे जिसे आजकल रामघाट कहा जाता है। बलिया जिले में ही कोरा में भगवान शिव ने कामदेव को भष्म कर दिया था। जिसे कामेश्वर नाथ कहा जाता है।

बलिया और बक्सर के पास चितबड़ागांव में राक्षस सुबाहु का घर था। यहां पर बड़ा सा टीला है जहां वह रहता था। श्रीराम ने उसका वध किया था। इसके आगे भरोली और उजियार है जिसके पास जंगलों में ताडक़ा रहा करती थी। ताडक़ा वध के स्थान को ही अब चरित्रवन कहा जाता है। स्त्री की हत्या से भगवान राम दुखी थे और उन्होंने जिस स्थान पर स्नान किया उसे आजकल रामघाट कहा जाता है। इसके बाद भगवान शिव की उपासना किया था जिसे आजकल रामरामेश्वर नाथ कहा जाता है। बिहार के बक्सर जिले में ही एक स्थान अहिरौली है, जिसे अहिल्या स्थल के रुप में जाना जाता है। माना जाता है कि यहीं पर भगवान राम ने अहिल्या का उद्धार किया था।

आदित्य आनंद बताते हैं कि बिहार के वैशाली जिले में गंगातट पर राम लक्ष्मण ने विश्राम किया था। पास में ही मधुबनी जिले में फुलहर गांव है, जहां माता सीता ने गौरी पूजन किया था और प्रथम बार श्रीराम ने सीता को अपलक देखा था। यहीं पर गिरीजा मंदिर भी है।

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विनय प्रेम बस भई भवानी।

खसी माल मूरत मुस्कानी।।
(श्रीराम चरित मानस, बालकांड, गोस्वामी तुलसीदास)

मधुबनी से कुछ दूरी पर बसहिया स्थान है, जानकार बताते हैं कि स्वयंवर के दौरान यहीं पर विवाह मंडप बनाया गया था। यहीं पर ऋषि विश्वामित्र आश्रम भी है और थोड़ी दूरी पर दुधमति नदी है जिसे पार करके भगवान श्रीराम नेपाल पहुंचे थे। आज भी इस क्षेत्र में भगवान श्रीराम के दुल्हे के रुप में पूजा की जाती है। भगवान शिव का धनुष यहीं पर था जिसे भगवान राम ने तोड़ा था। श्रीराम चरित मानस में इस स्थान को तुलसीदास ने रंगभूमि लिखा है।

धनुष टूटने के बाद जो अवशेष गिरे थे, उसे धनुषा मंदिर के रुप में जाना जाता है। जबकि राम और सीता का विवाह जहां पर हुआ वह लक्ष्मीनारायण मंदिर आज भी विद्यमान है। लोक परंपरा में लोग विवाह के अवसर पर यहां की माटी ले जाते हैं जो मंडप में लगाया जाता है। विवाह परंपरा में दहेज दिखाई की रस्म होती है, भगवान श्रीराम को दहेज के रुप में जो कुछ भी मिला उसे रत्न सागर कहा जाता है। विद्याकुंड आज भी मौजूद है जिसे माना जाता है कि यहां पर सीता-राम का आमोद प्रमोद हुआ था।

जबकि जिस खेत से सीता प्रगट हुई थी, उस स्थान को सीतामढ़ी कहते हैं। यह नेपाल से सटा हुआ बिहार का सीमांत जिला है। यहां पर अनेक ऋषि-मुनियों के तपस्या का विवरण धर्मग्रंथों में मिलता है। रावण ने ऋषियों के रक्त से भरा घड़ा यही गड़वाया था। जिसके प्रभाव से सीता का उदगम हुआ था।

पूर्वी चंपारण में वह वेदी वन है, जहां विवाह की रस्म चौथे दिन पूरी की गई थी। जब भगवान श्रीराम की बारात अयोध्या के लिए लौटने लगी तब उसका विश्राम स्थल उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिले में डेरवा नामक स्थान पर था। यहीं पर दोहरीघाट में भगवान परशुराम की भेंट श्रीराम से हुई थी। इसके बाद बस्ती जिले में बारात ने विश्राम किया जिसके बाद बारात अयोध्या पहुंंच गई थी।

अयोध्या और मिथिला क्षेत्र की दो संस्कृतियों का मिलन का अद्भुत व्याख्या हमारे विभिन्न धर्मग्रंथों में हैं और ऋषि विश्वामित्र को प्रथम सांस्कृतिक राजदूत कहा जा सकता है। कालक्रम में अयोध्या बार-बार उजड़ती और बसती रही है। हम इसकी भी चर्चा आगे करेंगे। हम यह भी बताएंगे कि किस प्रकार मुगल और ब्रिटीश काल में अयोध्या प्रभावित होती रही है। लेकिन मिथिला ने अपनी संस्कृति को आज भी छाती से लगाकर रखा है, जो हमारी समृद्ध विरासत, संस्कृति और पहचान से जुड़ी है। भारत के गर्भनाल से जुड़ी है...

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