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कम वर्षा में किसान रोग से कैसे बचाएं अपनी फसल, वैज्ञानिकों ने दी क्लाइमेट स्मार्ट तकनीकी एवं धान रोग नियंत्रण की जानकारी

पूर्वांचल मेें धान खरीफ की मुख्य फलस है। धान के बेहतर उत्पादन के लिए अच्छी बरसात की जरूरत होती है लेकिन इस बार औसत से काफी कम बरसात हुई है जिसके कारण धान की फसल का विकास तो प्रभावित है ही साथ ही रोगों का खतरा बढ़ा हुआ है। किसान ऐसी परिस्थिति अपने फसल की सुरक्षा कैसे करे। इस बारे में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा उन्हें जानकारी दी गई।

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किसानों को तकनीकी जानकारी देते कृषि वैज्ञानिक

किसानों को तकनीकी जानकारी देते कृषि वैज्ञानिक

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. धान खरीफ की मुख्य खाद्यान्न फसल है। इसके अच्छे उत्पादन के लिए 30 से 200 इंच तक की वर्षा उपयुक्त होती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जनपदों में इस वर्ष काफी कम वर्षा होने से धान की खेती प्रभावित हुई है। जुलाई माह में देर से वर्षा शुरू हुई लेकिन किसानों ने किसी तरह फसल लगा दी लेकिन अगस्त में मानसून का हाल और भी ख़राब रहा तथा वर्षा अत्यंत कम हुई। सितंबर में भी कमोबेस स्थिति ऐसी ही है। वर्षा कम होने और 35 से 36 डिग्री सेल्सियस तापमान के कारण फसल को विकास प्रभावित है। वर्षा न होने और तापमान अधिक होने के कारण फसलों में खरपतवारों व बीमारी आदि का तीव्र प्रकोप हो रहा है। जिससे पौधे छोटे रह गए तथा बैक्टीरियल झुलसा, शीथ ब्लाइट जैसी बीमारियों से प्रकोपित हो रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ सावधानी व तकनीकों का इस्तेमाल कर हम अपनी फसलों को बचा सकते हैं।

कृषि विज्ञान केंद्र कोटवा के वरिष्ठ वैज्ञानिक फसल सुरक्षा डॉ. रुद्र प्रताप सिंह ने बताया कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को देखते हुए कृषि सम्बन्धी विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, कृषि विश्वविद्यालय एवं भारतीय अनुसन्धान परिषद् के विभिन्न संस्थान क्लाइमेट स्मार्ट मैनेजमेंट प्रैक्टिसेज पर कार्य कर रहे हैं।कृषि विज्ञान केंद्र कोटवा आजमगढ़ पर अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसन्धान संस्थान फिलीपींस के दक्षिण एशियाई अनुसन्धान केंद्र वाराणसी के सहयोग से मशीन द्वारा धान की सीधी बीजाई पर एक परियोजना 2021 में स्वीकृत की गयी है जिसके अंतर्गत जनपद में इस वर्ष 50 एकड़ क्षेत्रफल में धान की बोआई कराई गई है। इस विधि से धान की बोआई करने से किसान की श्रम शक्ति, सिंचाई, बीज की मात्रा, समय आदि की बचत हो रही है। इस वर्ष सूखा की संभावना के दृष्टिगत यह तकनीकी किसानों में काफी लोकप्रिय हो रही है।

धान की फसल में वर्तमान में कुछ रोग लग रहे हैं तथा कुछ रोगों के लगने की संभावना है। इसके बारे में किसानों को जानकारी होनी अत्यंत आवश्यक है। धान में इस समय शीथ ब्लाइट या सडुआ रोग का प्रकोप हो रहा है जो अल्टरनेरिया सोलेनाई नामक फफूंद से फैलता है। यह एक भूमि जनित रोग है जो भूमि से पौधों में संक्रमण करता है। इस रोग में सर्वप्रथम पौधों के जड़ों के आस पास की पत्तियां प्रभाव में आती हैं और सूखने लगती हैं। जब दिन में तापमान और वातावरण में नमी अधिक हो तो रोग की उग्रता बढ़ जाती है। रोग के नियंत्रण के लिए यदि संभव हो तो खेत का अधिक पानी निकल दें। यूरिया का प्रयोग न करें। कार्बेन्डाजिम 50 डब्लूपी 1.0 किग्रा. दवा 500 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें अथवा प्रोपिकोनाज़ोल 25 ईसी 1.0 मिली प्रति लीटर पानी की दर से या फिर हेक्सकोनाज़ोल 5 ईसी 2.0 मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिडकाव करें। आवश्यकतानुसार 1 सप्ताह के अंतराल पर दूसरा छिडकाव करें।

धान की प्रमुख बीमारी फाल्स स्मट, आभासी कंड, लेढा या हल्दिया रोग है। अधिक उत्पादन देने वाली तथा अधिक नत्रजनीय उर्वरक प्रयोग किये हुए खेतो में इस रोग के प्रकोप की संभावना ज्यादा रहती है। जब धन की फसल पुष्पन अवस्था में होती है तभी से इसका प्रकोप दिखाई देने लगता है। प्रभावित दानों के अन्दर रोग जनक फफूंद अंडाशय को एक बड़ी संरचना में बदल देते हैं जो बाद में जैतूनी रंग के दिखाई देते हैं। इसके कारण उपज में भारी कमी आ जाती है तथा चावल की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। इस रोग से ग्रसित पौधों के बीजों को कदापि अगले वर्ष बोआई न करें। नर्सरी डालने के पहले कार्बेन्डाजिम 50 डब्लूपी 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से बीज शोधन करें। फसल में पौधों की पुष्पन अवस्था में ही कार्बेन्डाजिम 50 डब्लूपी 2.0 ग्राम अथवा प्रोपिकोनाज़ोल 25 ईसी 1.0 मिली प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।

कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी अधिकारी एवं सह अधिष्ठाता कृषि महाविद्यालय, कोटवा प्रा. डीके सिंह ने बताया कि जलवायु परिवर्तन को दृष्टिगत रखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक कसानों को मौसम पूर्वानुमान व फसल संबंधी सलाह देते रहते हैं जिससे कि सूखा, बाढ़, बीमारी आदि प्राकृतिक आपदाओं से फसल को बचाया जा सके। साथ ही मौसम पूर्वानुमान के आधार पर कृषि कार्यों का समन्वय करते हुए लागत कम की जा सके। सूखे के दृष्टिगत केंद्र द्वारा धान की फसल के अतिरिक्त अरहर, मक्का व खरीफ की सब्जियों की भी बोआई करने की सलाह दी गई थी जिसे किसानों ने अपनाया और अरहर व मक्का आदि फसलें अच्छी दशा में हैं।