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आजमगढ़ लोकसभा: 70 साल में गांव को एक पुल तक नहीं दे सके राजनेता

नेताओं की ओर से उपेक्षित यह गांव में अधिकतर जनसंख्या निषाद जाति की।

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Azamgarh Lok Sabha Ground Report

आजमगढ़ ग्राउंड रिपोर्ट

आजमगढ़. इस जिले ने वर्ष 1978-97 में प्रदेश को मुख्यमंत्री दिया तो 2014 देश के रक्षा मंत्री व प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके मुलायम सिंह यादव को सांसद बनाया। बारी बारी से सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस को यूपी की बागडोर सौंपी लेकिन गांव के गरीबों की तरफ कभी किसी सरकार ने ध्यान नहीं दिया। देश के प्रधानमंत्री से लेकर यूपी के सीएम तक 2022 तक सभी को आवास देने का दावा कर रहे हैं लेकिन इस जिले का एक गांव ऐसा है जिसमें पिछले सत्तर साल में सिर्फ 20 लोगों को आवास मिला है जबकि 90 प्रतिशत आबादी झुग्गी झोपड़ियों में रहती है। वर्ष 2017 में अगलगी में 64 घर जल गए लोग बरबाद हो गए लेकिन सरकार ने आपदा राहत से सिर्फ 36 लोगों को आवास दिया बाकि लोग आज भी राहत की बाट जोह रहे हैं। इस गांव में एक अदद पुल तक नहीं है। गांव के लोग बाढ़ हो या सूखा नदी पार कर ही गांव से बाहर निकल पाते है।

यह हाल है मुलामय सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र में आने वाली विधानसभा गोपालपुर के महाजी देवारा जदीद गांव का। इस गांव में में नब्बे प्रतिशत निषाद जाति के लोग रहते है। इसके अलावा सात प्रतिशत यादव और तीन प्रतिशत दलित है। गांव की आबादी 3500 है और यहां चार सौ परिवार निवास करते है। इसमें करीब 25 घर यादव, 10 घर दलित है। बाकी निषाद जाति के लोग रहते हैं। दियारा में होने के कारण यहां के लोग हर साल बाढ़ का दंश झेलते हैं। वहीं हर साल यहां के लोग आगलगी के शिकार होते है। कारण कि यहां के सभी निषाद झुग्गी झोपड़ियों में ही गुजर बसर कर रहे हैं। कई बार यहां आगलगी में जनहानि भी हो चुकी है। यहां वर्ष 2017 के पूर्व सिर्फ 20 परिवारों को आवास मिला था।

वर्ष 2017 में यहां हुई आगलगी की घटना में 64 झोपड़ियां जल गयी थी। बड़ी संख्या में पशु झुलस कर मर गए थे। इस घटना के बाद जब हिंद सेवा दल निषाद सेना आंदोलन शुरू किया तो प्रशासन ने आपदा राहत के तहत सभी परिवारों को आवास देने का आश्वास दिया लेकिन आज तक सिर्फ 36 लोगों के ही आवास स्वीकृत हो सके है। बाकी लोग आज भी आवास की वाट जोह रहे हैं। जबकि सरकार का दावा है कि वह हर गरीब को आवास देने के लिए कटिबद्ध है। इसके पूर्व वर्ष 2007 के चुनाव में यहां पुल का मुद्दा उठा था। उस समय बसपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आयी थी। बसपा सरकार में यहां पुल भी स्वीकृत हुआ। जिसकी लागत 64 हजार रूपये थे।

कार्यदायी संस्था ने उस समय 41 लाख रूपया निकाला और पावे खड़े करा दिये। इसके बाद योजना लगात के रिवीजन का प्रयास किया ताकि बजट बढ़ जाय लेकिन ऐसा नहीं हुआ और कार्यदायी संस्था ने काम बंद कर दिया। यहां पावा बने 12 साल गुजर चुके है। इसी बीच वर्ष 2012 में यूपी में सपा की पूर्ण बहुमत सरकार आयी और वर्ष 2017 में भाजपा ने भी पूर्ण बहुमत से यूपी में सरकार बना लिया लेकिन पुल का काम आजतक शुरू नहीं हुआ। गांव के प्रधान रामनाथ का कहना है कि पिछले सत्तर साल में यहां विकास की किरण नहीं पहुंची है।

अगर थोड़ा थोड़ा काम हुआ होता तो आज गांव बदहाल नहीं होता। बाढ़ हो या सूखा हमारे लोगों को नदी पार कर के ही बाहर जाना पड़ा है। बाढ़ के समय बच्चों की पढ़ाई बंद हो जाती है। बस चुनाव में नेता आते हैं और आश्वासन देते है लेकिन जीतने के बाद कोई मुड़कर नहीं देखता। इस मामले में हिंद सेवा दल निषाद सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राम किशुन निषाद का कहना है कि निषाद जाति के लोगों को राजनीतिक दल सिर्फ वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करता है। मत हासिल करने के बाद उनकी तरफ मुड़कर नहीं देखता है।

इस गांव की बदहाली खुद हकीकत बयां कर रही है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि 12 साल में तीन अलग-अलग दलों की सरकार बनी लेकिन एक पुल का निर्माण पूरा नहीं हो सका। बाकि और क्या उम्मीद सरकार से कर सकते हैं। इस बार चुनाव में हम निषादों की बदहाली और पुल को मुद्दा बनाएंगे। जबतक पुल नहीं बन जाता इस गांव के लोग किसी दल का साथ नहीं देंगे।

By Ran Vijay Singh