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आजमगढ़ में अक्सर आते हैं चौकने वाले परिणाम, कभी इंदिरा गांधी ने पलटी थी हारी हुई बाजी को कभी रामकृष्ण ने रचा था इतिहास

आजमगढ़ संसदीय सीट पर हुए उपचुनाव का परिणाम 26 जून का आएगा लेकिन कम वोटिंग के कारण यह कह पाना मुश्किल है कि बाजी किसके हाथ लगेगी। यही वजह है कि राजनीतिक दलों में बेचैनी साफ दिख रही है। कारण कि अक्सर आजमगढ़ के परिणाम चौकाने वाले रहे है। कई बार तो ऐसे लोगों के सिर जीत का सेहरा बंधा है जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी। कम वोटिंग के बाद एक बार फिर यह अंदेशा जताया जा रहा है कि परिणाम फिर चौकाने वाले हो सकते है।

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चुनाव प्रचार करती पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)

चुनाव प्रचार करती पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. लोकसभा उपचुनाव के लिए मतदान हो चुका है। परिणाम 26 जून को आएगा लेकिन कम वोटिंग ने राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। वैसे भी आजमगढ़ जिला बड़ा उलटफेेर करने का माहिर माना जाता है। कई बार यहां चौकाने वाले परिणाम आये है। कभी यहां पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने हारी हई बाजी पलट कर कांग्रेस को संजीवनी दी थी तो कभी रामकृष्ण यादव बसपा का खाता खोल मायावती को यूपी में पहली जीत का दीदार कराया था। इस बार भी माना जा रहा है कि चुनाव परिणाम चौकाने वाले हो सकते हैं। खासतौर पर सपा मुखिया ने मतदान के बाद तत्काल जिस तरह से धांधली का आरोप लगाया उससे यह संभावना और बलवती दिख रही है। कारण कि लोगों का मानना है कि शायद उन्हें भी अपने गढ़ पर भरोसा नहीं है।

गौर करें तो आपातकाल के बाद वर्ष 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार मिली थी। जनता पार्टी के राम नरेश यादव ने जीत हासिल की थी। चुनाव के कुछ दिन बाद ही राम नरेश यादव का यूपी का मुख्यमंत्री बना दिया गया। इसके बाद उन्होंने आजमगढ़ संसदीय सीट से त्यागपत्र दे दिया था। वर्ष 1978 में उपचुनाव हुआ। उस समय इंदिरा के सबसे करीबी पूर्व केंद्रीय मंत्री चंद्रजीत यादव पार्टी साथ छोड़कर कांग्रेस एस में चले गए थे। कांग्रेस की हालत पूरे देश में खराब थी। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं पीसीसी सदस्य मुन्नू यादव बताते हैं कि पहले कांग्रेस ने उपचुनाव न लड़ने का फैसला किया था लेकिन एकाएक इंदिरा जी ने बड़ा फैसला किया और मोहसिना किदवई को मैदान में उतार दिया।

चुंकि उस समय कांग्रेस का पूरे देश में विरोध था। इसलिए कोई उम्मीद नहीं कर रहा था कि बारबंकी से आकर मोहसिना चंद्रजीत यादव और रमवचन यादव जैसे मझे हुए खिलाड़ियों को टक्कर दे सकती हैं लेकिन खुद इंदिरा गांधी ने मोर्चा संभाला और वे मैदान में उतर गयी। करीब एक हफ्ते तक वे आजमगढ़ रही। सरकार के दबाव में उन्हें होटल तक नहीं मिला तो उन्होंने चंडेश्वर, कप्तानगंज सहित कई मंदिरों में प्रवास किया और मोहिसिना के लिए वोट मांगे। परिणाम रहा कि हारी हुई बाजी पलट गयी। मोहसिना किदवई 1.30 लाख मत हासिल कर सांसद चुनी गयी जबकि जनता पार्टी के रामवचन यादव को मात्र 95 हजार वोट मिले जबकि कांग्रेस एस के पूर्व केंद्रीय मंत्री चंद्रजीत यादव को मात्र 17 हजार वोट मिला था। जबकि उस चुनाव में चंद्रजीत और रामवचन यादव को जीत का दावेदार माना जाता था। इस परिणाम ने उत्तर भारत में कांग्रेस का संजीवनी प्रदान की थी।

रामकृष्ण यादव ने यूपी में खोला था बसपा का खाता
वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही उलटफेर देखने को मिला था। उस समय जनता दल ने अपने कद्दावर नेता त्रिपुरारी पूजन सिंह उर्फ बच्चा को मैदान में उतारा था। जबकि कांग्रेस से पूर्व सांसद संतोष सिंह मैदान में थे। सपा ने अधिवक्ता रामकृष्ण यादव को मैदान में उतारा था। रामकृष्ण यादव उस समय राजनीति के नवोदित खिलाड़ी थी। उनकी पहचान सिर्फ एक अधिवक्ता के तौर पर थी। चुनाव में त्रिपुरारी पूजन सिंह उर्फ बच्चा बाबू को जीत का प्रबल दावेदार माना जाता था लेकिन जातिगत आधार पर वोटों का बटवारा हुआ। यादव मतदाता बिरादरी के नामपर रामकृष्ण यादव के साथ चला गया। परिणाम रहा कि रामकृष्ण यादव 1.43 लाख मत पाकर विजई हुए और त्रिपुरारी पूजन सिंह दस हजार वोट से चुनाव हार गए। उन्हें 1.33 लाख वोट मिला। वहीं संतोष सिंह 1.6 लाख वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे। इस चुनाव में मायावती और कांशीराम खुद चुनाव हार गए थे। पार्टी को एक सीट पंजाब और एक आजमगढ़ में मिली थी। रामकृष्ण यूपी मेें बीएसपी के पहले सांसद बने थे।

फिर हो सकता है बड़ा उलटफेर
एक बार फिर उपचुनाव के लिए जिले में गुरुवार को मतदान हुआ है। 26 जून को परिणाम आएगा। इस बार चुनाव में वर्ष 2019 की अपेक्षा 8.46 प्रतिशत कम वोटिंग हुई है। वर्ष 2019 में 57.54 पतिशत वोटिंग हुई थी। जबकि उपचुनाव में 48.58 प्रतिशत लोगों ने मताधिकार का प्रयाग किया है। ऐसे में फिर बड़े उलटफेर की आशंका व्यक्त की जा रही है। स्वयं प्रत्याशी भी संसय में दिख रहे हैं। कारण कि तीन चुनाव बाद यहां पहली बार मुस्लिम मतदाताओं में बिखराव भी देखने को मिला है।