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किसान इस तरह करें गेंदा के फूल की खेती, कम लागत में होगी अच्छी आमदनी

पारंपरिक खेती में लगातार नुकसान उठा रहे किसान यदि आधुनिक तकनीकि का सहारा लेकर गेंदा के फूल की खेती करें तो कम लागत में बेहतर आमदनी कर सकते हैं। खास बात है कि गेंदा की खेती पर प्राकृतिक आपदा का खतरा भी कम होता है। गेंदा की खेती के लिए सरकार से अनुदान भी प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रतीकात्मक फोटो

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पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. पारंपरिक खेती के अलावा तमाम ऐसी खेती है जिससे किसानों की आय बढ़ सकती है। ऐसी खेती में गेंदे की खेती भी काफी लाभदायक हो सकती है। जिला उद्यान अधिकारी का कहना है कि किसान इससे कम लागत में अच्छी आय कर सकते हैं। इस फूल पर प्राकृतिक आपदा का भी खतरा कम होता है। सरकार फूल की खेती पर अनुदान भी देती है।

खेती क्यों है प्रासंगिक
गेंदे की हमारे देश में लोकप्रियता का कारण है और वह यह कि इसे विभिन्न भौगोलिक जलवायु में सुगमतापूर्वक उगाया जा सकता है। मैदानी क्षेत्र में गेंदे की तीन फसलें उगायी जाती हैं। इससे पूरे वर्ष फूल उपलब्ध रहते हैं। इसके फूल मुख्य रूप से माला बनाने, विवाह आदि में मंडप सजाने, कार सज्जा करने तथा धार्मिक अनुष्ठान में पूजा आदि के काम आते हैं। इसे गमलों तथा क्यारियों में भी सजावट हेतु उगाया जाता है।

क्या है लाभ
गेंदे की खेती में प्रति हेक्टेयर 150 से 175 कुंतल फूल का उत्पादन होता है। कुछ उन्नत किस्मों के फूल का उत्पादन प्रति हेक्टेयर 349 कुंतल है। फूल तोड़ाई के बाद प्रवधन जरूरी होता है। फूलों को प्रातःकाल में ही तोडऩा चाहिए। फूलों को सुरक्षित रखने के लिए आठ से अस्सी प्रतिशत तक आर्द्रता सर्वाेत्तम मानी जाती है।

कैसे करें सुरक्षा
कट फ्लावर के रूप में इस्तेमाल किये जाने वाले फूलों के पाम में एक चम्मच चीनी मिला देने से इसे अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके अलावा आर्द्रता पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। उत्पाद उपभोक्ता के समक्ष पेश करने व इसकी बिक्री के लिए प्रेरित करने में पैकिंग का भी विशेष महत्व होता है। इस पर ध्यान देना चाहिए।

कौन से लगते हैं रोग
गेंदा की फसल में आर्धपतन, खर्रा रोग, विषाणु रोग, मृदुगणन रोग आदि प्रमुख हैं। कलिका भेदक, पर्ण फुदका, थ्रिप्स, माइट आदि प्रमुख कीट इस फसल को प्रभावित करते हैं। रोग और कीटों से बचाव के लिए विशेषज्ञों से राय लेकर समय-समय पर उपचार करते रहना चाहिए।


गेंदा की प्रमुख प्रजातियां
मैक्सीन गेंदाः इस प्रजाति के टगेट्स, ल्यूसिडा, टगेट्स लेम्मोरी, टगेट्स माइन्यूटा, फ्रेंच गेंदा काफी उपयोगी हैं। यह सीधा व झाड़ीनुमा पौधे होते हैं। इसका फूल 2.5 सेमी व्यास का होता है। इसके अलावा कुछ आकर्षक किस्में जैसे बोलेरो, वटर स्कोच, वटर वाच, ब्राउन स्काउट, गोल्डी, गोल्ड आरेंज, गोल्ड नजेम, फायर गिलो, रेडकोट, लेम्नेरिक, लेमन जेल आदि प्रजाति की भी खेती की जा सकती है। धारीदार मैक्सीन गेंदाः इस प्रजाति में सीधे बढऩे वाले पीले रंग के फूल आते हैं। इसकी प्रमुख किस्में गोल्डेननेम, कलेक्टैड, आयरिस लैस आदि हैं।

गेंदा की संकर किस्में
नगेट, टेट्रासफड रेड, पूसा नारंगी, पूस बसन्ती आदि प्रमुख संकर प्रजातियां हैं। उचित वनस्पति विकास एवं फूलों के समुचित विकास के लिए धूप वाला वातावरण सर्वाेत्तम माना जाता है। उचित जलनिकास वाली बलुवार दोमट मिट्टी इसकी खेती के लिए उचित मानी गयी है। जिस भूमि का पीएच मान 7 से 7.5 के बीच हो वह खेती के लिए अच्छी होती है। छारी व अमलीय मृदा इसकी खेती के लिए अभिशाप है।

कैसे करें बोआई
गेंदा की बोआई मार्च से जून तथा अगस्त-सितम्बर माह में होती है। संकर किस्मों के लिए सात सौ से आठ सौ ग्राम बीज प्रति हेक्टेयर तथा अन्य प्रजातियों के लिए 1.25 किलोग्राम बीज पर्याप्त माना जाता है। इसके बीज एक वर्ष से अधिक के लिए अच्छे नहीं माने जाते। ऐसे बीज की बोआई पर उपज घट जाती है इसलिए नये बीज की ही बोआई करनी चाहिए। फसल की नर्सरी बीस से तीस दिन में तैयार हो जाती है। इसके बाद रोपाई उचित भूमि पर की जाती है।

रोपाई में दें ध्यान
गेंदा की रोपाई के पूर्व खेत में प्रति हेक्टेयर 250 से 300 कुंतल गोबर की खाद, 120 किग्रा नाइट्रोजन, 80 किग्रा फास्फोरस, 80 किग्रा पोटास का छिड़काव कर खेत की जोताई और उसके बाद फसल की रोपाई करनी चाहिए। दो पौधों के बीच 45 से 60 सेमी की दूरी होनी चाहिए। रोपाई के बाद समय-समय पर पौधों की सिंचाई करने से उत्पादन अच्छा हो सकता है।