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इस महान संत के दरबार से आज तक खाली नहीं लौटा कोई भक्त, समाधि पर चढ़ती है चादर, कच्ची खिचड़ी और लाल गन्ना

गोविंद साहब मेला 12 दिसंबर को शुरू होगा। एक महीने तक चलने वाले मेले की तैयारियां जोरशोर से चल रही है। मेले में लाखों लोग बाबा के दर पर मत्था टेकेंगे। मान्यता है कि बाबा के दर से आजतक कोई खाली हाथ नहीं लौटा। यहीं वजह है कि गोविंद दशमी के दिन यहां पूरे देश से भक्त पहुंचते हैं।

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गोविन्द साहब

गोविन्द साहब

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. अम्बेडकर नगर आजमगढ़ के सीमावर्ती गांव अहिरौली में स्थित सिद्ध संत महात्मा गोविन्द साहब का धाम लाखों लोगों के आस्था का केंद्र है। लाखों लोग यहां संत के दर्शन के लिए पहुंचते है। गोविंद दशमी को यहां भव्य मेंले का आयोजन होता है। एक महीने तक चले वाले मेले का शुभारंभ 12 दिसंबर को होगा। दुकानें अभी से सज गयी है। प्रशासन तैयारियों को सुदृढ़ बनाने में जुटा हुआ है। यहां लोग संत की समाधि पर खिचड़ी और चादर चढ़ाकर सुख समृद्धि की कामना करते हैं।

कहा जाता है कि जब-जब लोगों का मन धार्मिक आस्था से हट जाता है, बुराइयों का साम्राज्य स्थापित हो जाता है, तो समय-समय पर हर युग और काल में मानव समाज के सही मार्गदर्शन के लिये किसी न किसी रूप में ईश्वर का अवश्य अवतार होता है। इसी प्रकार सन्त गोविन्द साहब का भी अवतार मानवता को सत्य का सन्देश देने के लिए हुआ था। सन्त ने मनुष्यों को अज्ञानता के मार्ग से हटाकर ज्ञान के मार्ग का दर्शन कराया।

इन्हीं महापुरुषों में से एक शांति, सौहार्द एवं सांप्रदायिक एकता के प्रतीक सिद्ध महंत महात्मा गोविन्द साहब जी महराज थे। उनकी समाधि स्थल पर संगमरमर के टुकड़ों से तैयार चांदी की भांति चमकते विशाल मंदिर से सटे भव्य सरोवर के स्वच्छ जल में इठलाती रंग-बिरंगी मछलियां आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं। मान्यता है कि गोविन्द साहब के ध्यान मात्र से किसी समय मेें बलिया के व्यापारी की माल से लदी हुई नाव समुद्र में डूबने से बच गयी। ऐसे महान संत की तपोस्थली एवं समाधि स्थल जनपद फैजाबाद (अब अम्बेडकर नगर) के पूर्वी छोर पर एवं आजमगढ़ जिले की सीमा से सटे गांव अहिरौली में स्थित है।

सन 1709 में अवतरित हुए गुलाल पंथ के प्रवर्तक गुलाल साहब के शिष्य भीखा साहब के तमाम शिष्यों में प्रमुख शिष्य के रूप में बाबा गोविन्द साहब का नाम सदा से अविस्मरणीय रहा है। अंबेडकर नगर में स्थित तहसील जलालपुर के बगल में बहने वाली तमसा नदी के तट पर बसे एवं हथकरघा उद्योग के लिए विख्यात कस्बा नगपुर में वर्ष 1725 व विक्रमी संवत 1782 में विश्व शांति के अग्रदूत बाबा गोविन्द साहब महराज ने अगहन मास शुक्ल पक्ष दशमी दिन मंगलवार को भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण कुल में श्रीमती दुलारी देवी की कोख में अवतार लेकर इलाके की धरती को धन्य किया। इस प्रतिभावान बालक का बचपन का नाम गोविन्दधर द्विवेदी था। पिता का नाम पृथ्वीधर द्विवेदी व दो अन्य भाइयों का नाम गोपालधर द्विवेदी, घीसा द्विवेदी था।

भक्ति एवं साधना के समस्त लक्षणों वाले इस प्रतिभावान बालक ने माता-पिता की व्यवस्थानुसार जलालपुर में ही प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद सुरभारती के अध्ययन के लिये वाराणसी भेज दिया गया जहां कुशल गुरुओं से शिक्षा प्राप्त कर किशोरावस्था में ही वे संस्कृत के महान पंडित हो गये। गोविन्द साहब की यह पावनस्थली भेदभाव से दूर हिन्दू-मुस्लिम सभी के सत्संग के लिये कभी विख्यात रही है। जाति-पाति, छुआछूत का कोई स्थान ही नहीं था। समाज पर गोविन्द साहब का सबसे बड़ा उपकार यह है कि उन्होंने सभी धर्मों और जातियों को एकता के सूत्र में बांधने का कार्य किया।

आज भी यहां आने वाले श्रद्धालु समाधि पर चादर और चावल-दाल मिश्रित कच्ची खिचड़ी के अलावा रसपूर्ण गन्ना भी चढ़ाते हैं। मंदिर से सटे गोविन्द सरोवर में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं। गोविंद दशमी को यहां आयोजित मेले में चादर, खिचड़ी, गन्ना और सरोवर में स्नान भी समरसता और एकता के प्रतीक हैं। ताने-बाने से बुनी चादर भेदभाव समाप्त करती है और यही एकता की चादर गोविन्द साहब को प्रिय थी। खिचड़ी भी आंतरिक प्रेम का प्रतीक है। गन्ना प्रसाद के रूप में मधुरता का पावन प्रतीक माना जाता है।