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#UpTravelGuide दुनियां का इकलौता मंदिर जहां होती है खंडित शिवलिंग की पूजा, महर्षि दुर्वासा ने की थी तपस्या

यहां द्रोणाचार्य का भी आश्रम है जिसे सरकार पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है

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durvasha dham in azamgarh

यहां द्रोणाचार्य का भी आश्रम है जिसे सरकार पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है

आजमगढ़. जिला मुख्यालय से 36 किमी की दूरी पर स्थित दुर्वासा धाम जिले के सबसे बड़े पर्यटक स्थल के रूप में विख्यात है। ऐतिहासिक विशेषता के कारण दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। इस स्थाना का नाम दर्वासा धाम इसलिए पड़ा क्योंकि सती अनुसुइया एवं अत्रि मुनि के बड़े पुत्र महर्षि दुर्वासा 12 वर्ष की आयु में चित्रकूट से फूलपुर तहसील क्षेत्र के वर्तमान गांव बनहर मय चक गजड़ी के पास तमसा-मंजूसा नदी के संगम स्थल पर पहुंचे थे। यहां उन्होंने वर्षों तक तप किया।

पौराणिक कथाओं के अनुसार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग में महर्षि दुर्वासा उक्त स्थान पर रहे। कलयुग के प्रारम्भिक काल में वे तप स्थल पर ही अन्तध्र्यान हो गये। वहां आज उनकी भव्य प्राचीन प्रतिमा है। जिस स्थान पर वे शिव की आराधना करते थे वहां आज भी खंडित शिवलिंग मौजूद है। पूरे एशिया में यही एक स्थान है जहां खंडित शिवलिंग की पूजा होती है।

कथाओं के अनुसार एक बार नदी में स्नान करते समय दुर्वासा ऋषि का वस्त्र नदी की धारा में प्रवाहित हो गया था। उस समय कुछ ही दूरी पर स्नान कर रही द्रोपदी ने अपना आंचल फाड़ कर उन्हें प्रदान किया था। उस समय दुर्वासा ऋषि ने उन्हें वर दिया था कि यह वस्त्र खण्ड वृद्धि प्राप्त कर तुम्हारी लच्चा के रक्षा का कारण बनेगा।

इसी वर का प्रभाव रहा कि महाभारत काल में जब दुशासन ने द्रोपदी की साड़ी खींचनी शुरू की तो वह बढ़ती गयी। इसी प्रकार अनेक भक्तों की इनके द्वारा रक्षा की गयी। अभिज्ञान शाकुन्तलम में दुर्वासा जी का शाप प्रसिद्ध है। आतिथ्य में त्रुटि रह जाने के कारण इन्होंने कण्व ऋषि के आश्रम में शकुन्तला को शाप दिया था कि उसका पति उसे भूल जायेगा। एक बार भगवान विष्णु स्वयं दुर्वासा ऋषि के शाप से पीडित हुए थे। माना जाता है कि जब दुर्वासा जी 12 वर्ष की आयु से कलयुग के उदय काल में अंर्तध्यान होने तक यहीं रहे तो द्रोपदी को श्राप भी यहीं दिया होगा। कारण कि इस स्थल से कुछ दूरी पर ही द्रोणाचार्य का भी आश्रम है जिसे सरकार पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर रही है।

प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा को दुर्वासा धाम पर तीन दिवसीय मेला लगता है। जिसमें देश विदेश के चार से पांच लाख लोग पहुंचते है। मान्यता है कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन संगम में स्नान कर दुर्वासा का दर्शन करने से सौ पापों से मुक्ति मिलती है।