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जब गांधी जी ने यहां से फूंका था आजादी का बिगुल, 75 हजार लोगों में भरा था देशभक्ति का जज्बा

आजादी लड़ाई में आजमगढ़ ने हमेंशा अग्रणी की भूमिका निभाई। यहां क्रांतिकारियों ने 3 जून 1857 को ही आजादी का परचम लहरा दिया था। 3 अक्टूबर 1929 को भारत भ्रमण के दौरान खुद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी आजमगढ़ पहुंचे थे। उन्होंने एसकेपी के मैदान में 75 हजार लोेगों को संबोधित कर उनमें देशभक्ति का जज्बा भरा था।

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प्रतीकात्मक फोटो

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पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. 1857 की क्रांति रही हो या फिर 1942 का असहयोग आन्दोलन अथवा स्वदेशी आन्दोलन इसमें आजमगढ़ का योगदान किसी से छिपा नहीं है। 3 जून 1857 को आजादी का झंडा लहराने वाले क्रान्तिकारियों ने हमेंशा अंग्रेजों का डटकर मुकाबला किया। खुद गांधी जी भी आजादी के दिवानों को प्रोत्साहित करने के लिए आजमगढ़ पहुंचे थे। उन्होंने 3 अक्टूबर 1929 को एसकेपी के मैदान में सभा को सम्बोधित किया था जिसमें 75 हजार लोग शामिल हुए थे। गांधी जी द्वारा शिब्ली एकेडमी के नाम लिखे गये तमाम पत्र आज भी सुरक्षित हैं जो गांधी जी के आगमन की हमें याद दिलाते हैं।

बता दें कि 2 फरवरी 1919 को अखिल भारतीय कांग्रेस की स्थापना हुई। उस समय शिब्ली एकेडमी के सैयद सुलेमान नदवी से गांधी जी के संबंध काफी अच्छे थे। मौलाना सैयद सुलेमान नदवी उस समय हिन्दुस्तानी खिलाफत डेलीगेशन कमेटी के सदस्य भी थे। जिला कमेटी के अध्यक्ष आजादी के बाद जिले के पहले सांसद रहे सीताराम अस्थाना बने थे। ठाकुर सूर्यनाथ सिंह को मंत्री पद दिया था। इसी वर्ष शहर के पहाड़पुर में गांधी राष्ट्रीय विद्यालय की स्थापना की गयी जो स्वदेशी आंदोलन की रीढ़ था। उस समय जिले में 13 स्वराज आश्रमों की स्थापना भी की गयी थी। यही नहीं जिले में कई पंचायती अदालतों का गठन भी किया गया था।

पंचायती अदालतें कांग्रेस के निर्देशन में झगड़ों को निपटाती थी। इसी बीच 17 नवंबर 1921 को ब्रिटिश साम्राज्य के युवराज ड्यूक आफ केनायर के आगमन का जिला कांग्रेस कमेटी की तरफ से विरोध किया गया था। फरवरी 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में सीताराम अस्थाना, शिवफेर सिंह, सूर्यनाथ सिंह, भगवती प्रसाद ने सब्जी मंडी हाल में विरोध सभा का आयोजन किया था। इसके बाद 3 अक्टूबर 1929 को गांधी जी का आगमन आजमगढ़ के एसकेपी इंटर कालेज परिसर में हुआ था, जहां उन्होंने 75 हजार लोगों को सम्बोधित किया था। इसके बाद वह गोरखपुर चले गये थे। गांधी जी द्वारा प्रवास के दौरान जिस स्थान पर विश्राम किया गया या जहां स्नान किया गया वे अवशेष आज भी यहां उपलब्ध हैं।