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पूर्वांचल से यूपी की राजनैतिक फिजा बदलेंगी माया

मुलायम के गढ़ में सपा को चुनौती देंगी मायावती

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Sarweshwari Mishra

Aug 28, 2016

आजमगढ़.
यूपी विधान सभा चुनाव 2017 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक पार्टियां अपना दम खम दिखाने में जुट गई हैं। आज आजमगढ़ में बीएसपी प्रमुख मायावती ने इस रैली में अपनी ताकत दिखाने की पूरी तैयारी में हैं। रैली में दो लाख तक की तादाद में लोग मायावती को सुनने पहुंच रहें हैं। लेकिन क्या मायावती रैली के बाद राजनीतिक फिजा में बदलाव होगा।


मुलायम के गढ़ में बसपाई कार्यकर्ताओं का शहर के कोने कोने पर जनसैलाब उमड़ रहा। अभी तक बसपा और मायावती के करीबी नेता स्वामी प्रसाद मौर्या ने विधानसभा चुनाव 2017 में मायावती की पार्टी को छोड़कर भाजपा का हाथ थाम लिए हैं। और भी कई नेता भाजपा के तरफ अपना रुख बदल लिए हैं। फिर भी अभी से महिलाओं से लगायत बसपा कार्यकर्ताओं की जो भीड़ जुट रही है वह विपक्षियों के नींद जरूर उड़ा देगी।



बसपा के हित के लिए लकी रहा आजमगढ़

बसपा सुप्रीमों मायावती ने 2017 चुनाव का बिगुल 21 अगस्त को आगरा से फूंक दिया है। रैली इस कदर ऐतिहासिक रही कि लोग अपने वाहनों से रैलीस्थल पर पहुंचकर बहन जी के विचारों को सुना। पार्टी की रैली का रिकॉर्ड पार्टी ही तोड़ती है। आजमगढ़ की रैली में ऐतिहासिक भीड़ होगी कि विपक्षी भी उसकी कल्पना नहीं कर पाएगें। इस अवसर पर आजमगढ़ मंडल के तीनों जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रो के पदाधिकारी, पूर्व विधायक, घोषित प्रत्याशी, जिलाध्यक्ष व पार्टी के वरिष्ठ नेता उपस्थित रहे।


उस रैली में बसपा मुखिया मायावती ने मोदी समेत कांग्रेस, भाजपा और समाजवादी पार्टी पर करारा हमला किया। बता दें कि सत्ता में वापसी की कवायद में जुटी की यह पूर्वांचल में यह सबसे बड़ी रैली है। तीनों मंडलों से आई एलआईयू रिपोर्ट के मुताबिक रैली में दो लाख भीड़ पहुंचेगी।


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यूपी से स्वामी और दयाशंकर को लेकर भाजपा पर करेंगी हमला


यूपी की सत्ता में वापसी की राह देख रही बसपा पार्टी में मची भगदड़ से परेशान है। माना जा रहा है कि पूर्वान्चल में स्वामी प्रसाद मौर्या के प्रभाव को कम करने के लिए ही मायावती आजमगढ से चुनावी अभियान की शुरूआत करने का फैसला किया और यही वजह है कि इसे महारैली का नाम देते हुए तीन मंडलो के 67 विधानसभाओं के कार्यकर्ताओं को रैली में शामिल होने का निर्देश दिया गया। ताकि बसपा सुप्रीमो यह संदेश दे सके कि वरिष्ठ नेताओं के साथा छोडने के बाद भी वह कमजोर नहीं हुई है। आज भी बसपा का कैडर उनके साथ है। लेकिन इन सारी कवायदों के बीच वर्ष 2017 में बसपा का भविष्य क्या होगा इसका फैसला रैली की भीड़ करेगी।


वही दयाशंकर सिंह प्रकरण के बाद बसपा को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। खास तौर पर पूर्वान्चल में जिसे वह अपने गढ़ के तौर पर देखती रही है। क्षत्रिय वोट खिसके न इसके लिए बसपा ने पूर्वान्चल में कई क्षत्रियों को प्रत्याशी बनाया है। अब पहली बार मायावती पूर्वान्चल के सबसे अधिक सीटाें वाले जिले आजमगढ से चुनावी अभियान की शुरूआत कर स्थित को संभालने का प्रयास कर रही है।




माया का कितना अस्तित्व, भीड़ के सहारे बताने की करेंगी की कोशिश

वर्ष 2007 के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग के चलते बसपा पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आयी थी। एक बार फिर बसपा वही फार्मूला 2017 में लागू करना चाह रही है कारण की 2007 के चुनाव में सोशल इंजीनियरिंग से हटने का परिणाम था कि पार्टी को बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा था। खास तौर से आजमगढ़ जैसा जिला जिसे बसपा का गढ़ कहा जाता है और 1989 में जब मायावती और कांशीराम खुद लोकसभा चुनाव हार गये थे इस जिले में हाथी दौड़ी थी। रामकृष्ण यादव पार्टी के सांसद चुने गये थे।


2007 में भी पार्टी को छह विधानसभा सीटें मिली थी लेकिन 2012 में यह पार्टी एक सीट पर सिमट गयी थी, नौ सीटे बसपा के खाते में गयी थी। वर्ष 2017 के चुनाव के लिए बसपा पूरी तरह सोशल इंजीनियरिंग पर ध्यान दे रही है। जातिगत आंकड़ो को ध्यान में रखते हुए टिकट भी दिया जा रहा है। लेकिन पिछले तीन महिने में कई प्रत्याशियों के टिकट कटने और कई वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने के बाद बसपा नुकसान में दिख रही है।




चूंकि रैली में तीन मंडलों के 67 विधानसभाओं के कार्यकर्ताओं को भाग लेना है इसलिए यह दावा किया जा रहा है कि भीड़ आठ लाख से कम नही होगी। लेकिन आजमगढ आईटीआई मैदान की क्षमता मात्र 50 से 75 हजार की है। बहरहाल सबकी नजर रविवार को होने वाली बसपा की रैली पर है। इसमें दो राय नही है कि रैली में जुटने वाली भीड़ बसपा के भविष्य का फैसला करेगी। कारण कि यह माना जाता रहा है कि बसपा की रैली में उसका वोट बैंक ही शामिल होता है।


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