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Independence Day: जब फूलबदन सिंह ने कर दिया था अंग्रेजों की नाम में दम

फूलबदन सिंह ने न सिर्फ अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिका निभाई बल्कि आजमगढ़ का स्वाधीनता संग्राम पर दो भागों में किताबें भी लिखी ।

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Phulbadan singh

फूलबदन सिंह

आजमगढ़. स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले आंदोलनकारियों में शहर के हीरापट्टी गांव निवासी फूलबदन सिंह के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। जिला स्वाधीनता संग्राम सैनिक संघ के मंत्री और हरिऔध कलाभवन के पुस्तकालयाध्यक्ष भी रहे फूलबदन सिंह ने न सिर्फ अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में भूमिका निभाई बल्कि अंग्रेजी हुकूमत से देश के आजाद होने के बाद आजमगढ़ का स्वाधीनता संग्राम पर दो भागों में किताबें भी लिखी, जिसकी दुर्लभ एक-एक पन्ने का पढ़कर लोगों का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।

बताते हैं कि आंदोलन के दौरान एक तरफ अंग्रेजी पुलिस क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी कर रही थी तो दूसरे आंदोलनकारी शहर पर अधिकार करने की योजना बना रहे थे। सब कुछ के बाद भी फूलबदन सिंह की तलाश में अंग्रेज पुलिस खाक छानती रह गई लेकिन उसके हाथ सफलता नहीं लगी।


15 अगस्त 1942 को नगर में जुलूस के बाद कांग्रेस कार्यालय अंग्रेजी पुलिस के अधिकार में चला गया था। उसके बाद कहीं निश्चित मुकाम नहीं रह गया। हीरापट्टी मंदिर का पुराना शिविर आजाद हो चुका था जहां रात में कतिपय कार्यकर्ता भोजन के बाद विश्राम करते थे, लेकिन यह भी पुलिस ने छिपा नहीं रहा। 16 अगस्त की सुबह पुलिस दस्ता सादी पोशाक में कतिपय गुप्तचरों के साथ हीरापट्टी भी पहुंचा। मंदिर के शिविर और फूलबदन सिंह के मकान का चक्कर लगा कर वापस चला गया।


पुलिस दस्ता शिवराम राय, फूलबदन सिंह और अर्जुन सिंह प्रमुख कार्यकर्ताओं की तलाश में आई थी लेकिन प्रथम बार की चपेट वाली गिरफ्तारी से बचने वाले अधिकांश कार्यकर्ता पहले ही देहात पकड़ चुके थे। नगर के कार्य संचालक के रूप में जो रहे गए थे वह रात में प्रकट होते रहे। शिवराम राय व हीरालाल आदि 15 अगस्त की रात में हीरापट्टी में रही रहे लेकिन उनका अड्डा कांग्रेस शिविर और फूलबदन सिंह का मकान नहीं था बल्कि फूलबदन के मकान के सामने वाला मकई के खेत का मचान था। ऐसे ही अन्य स्थान भी खेतों में ही बनाए गए थे जहां रात में विश्राम होता। बारिश होने की दशा में मंदिर वाले शिविर फूलबदन सिंह के मकान पर पहुंच कर रात काट ली जाती थी। 15 अगस्त की रात में ही लोगों ने यह निश्चय किया कि अब जनपद के हर सरकारी स्थानों पर अधिकार जमाने में अधिक विलंब नहीं करना चाहिए। इसके पूर्व एक निश्चित योजना के साथ अधिक व्यक्तियों की भी आवश्यकता थी।

इसके लिए फूलबदन सिंह और हीरालाल 16 अगस्त की सुबह ही पड़ोस के ग्रामीण क्षेत्रों में सहायता लेने के लिए निकल पड़े। शिवराम राय हीरापट्टी में ही केंद्रित रहकर जिले के विभिन्न भाग से आने वाले लोगों से संपर्क बनाए रखने के लिए मचान पर ही रहते थे। फूलबदन की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका को भगत सिंह के भाई और तत्कालीन कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे कुलतार से भी तारीफ करते थे। 1976 में जब फूलबदन सिंह गंभीर रूप से बीमार थे तो वह उनसे मिलने जिले में आए थे।

BY- RANVIJAY SINGH

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