
पीएम मोदी
आजमगढ़. मिशन-2019 की तैयारी में जुटे राजनीतिक दलों की राह आसान नहीं दिख रही है। एक तरफ विपक्ष के वार से घिरी बीजेपी गठबंधन की काट खोजने के लिए योजनाओं के दम पर 50 प्रतिशत मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए पूरी ताकत झोंक रही है तो दूसरी तरफ विपक्ष एम वाई डी फैक्टर को मजबूत करने में जुटा है लेकिन इनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा है नेताओं की महत्वाकांक्षा व कुर्सी की चाह। गठबंधन में जिन दलों के शामिल होने की संभावना है उनके नेतओें की महत्वाकांक्षा ही चुनाव में उनकी पार्टी के लिए मुसीबत बन सकती है।
गौर करें तो आजमगढ़ एक ऐसा जनपद है जहां करीब 22 प्रतिशत यादव और 19 प्रतिशत दलित मतदाता है। इसके अलावा करीब 16 प्रतिशत मुस्लिम है। सपा बसपा और कांग्रेस का गठबंधन होने की स्थित में यह वोट एक जगह जाना लगभग तय हैं। यदि देखा जाय तो तीनों जातियों के मत को मिला दिया जाय तो करीब 52 प्रतिशत मतदाता एक साथ हो जाते है। पोलिंग प्रतिशत की बात करें तो इन जातियों का वोट भी सबसे ज्यादा पोल होता है। ऐसे में यह गठबंधन कम से कम आजमगढ़ में सबसे ताकतवर नजर आता है। आजमगढ़ की दोनों सीटो सदर और लालगंज पर गठबंधन का दावा काफी मजबूत माना जा रहा है। यही वजह है कि गठबंधन में उम्मीदवारों की संख्या भी अधिक दिख रही है। कारण कि वोटों के आंकड़े के हिसाब से इन्हें अपनी जीत पक्की नजर आ रही है।
बात सपा की करें तो यहां बलराम यादव अपने पुत्र डा. संग्राम यादव को राजनीति में लगभग स्थापति कर चुके हैं लेकिन वे चाहते हैं कि संग्राम राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर नजर आयें। यही वजह है कि वर्ष 2014 में बलराम यादव ने संग्राम को टिकट दिलाने का प्रयास किया था लेकिन उस समय पार्टी ने मोदी लहर को देखते हुए संग्राम के बजाय बलराम यादव को टिकट दिया था लेकिन बाद में उनका टिकट काटकर हवलदार यादव को दे दिया गया था। कहते हैं कि टिकट कटा तो बलराम ने हवलदार का पर कतरने के लिए उनका भी टिकट कटवाया और मुलायम सिंह को आजमगढ़ से चुनाव लड़ने के लिए मना लिया। कारण कि बलराम यादव ही वह सख्श है जो हवलदार को राजनीति में लाये थे और अवसर को देखते हुए हवलदार समय के साथ बलराम के सबसे बड़े विरोधी हो गए। मुलायम सिंह यादव आजमगढ़ से चुनाव लड़कर सांसद चुने गए। गठबंधन की स्थित में एक सीट सपा और एक बसपा के खाते में जाने की संभावना है।
मुलायम और अखिलेश ने पहले ही साफ कर दिया है कि इस बार सपा संरक्षक आजमगढ़ से चुनाव नहीं लड़ेंगे। ऐसे में किसी स्थानीय नेता को ही चुनाव मिलना है।
अब बलराम, हवलदार, दुर्गा प्रसाद सहित पार्टी में टिकट के कई दावेदार है। सपा के तीनों गुट अपने लोगों को टिकट दिलाने के लिए बेचैन है। अब टिकट किसी को मिले दूसरा पक्ष भीतर ही भीतर उसका विरोध करेगा। जैसा की वर्ष 2004 से 2009 के बीच तीन चुनावों में बलराम यादव और दुर्गा प्रसाद यादव एक दूसरे के साथ कर चुके हैं। भीतरघात के कारण यहां सपा को तीन बार अपनी सीट गवांनी पड़ी है। अब बीजेपी के बाहुबली रमाकांत यादव भी सपा में आने की जुगाड़ सेट कर रहे हैं। रमाकांत के वापसी की शर्त ही टिकट है। ऐसे में यदि उन्हें टिकट मिलता है तो पार्टी में चार गुट सक्रिय हो जाएगे। बसपा के शाह आलम भी टिकट के लिए बेचैन हैं।
कुछ ऐसा ही हाल लालगंज सीट का है। मायावती ने गठबंधन की संभावनाओं को दरकिनार कर पहले ही घूरा राम को टिकट दे दिया है। घूरा राम मूलरूप से बलिया के रहने वाले हैं। उनका लालगंज क्षेत्र में जनाधार नहीं है। घूरा को टिकट पूर्व सांसद बलिराम यादव का टिकट काटकर मिला है। बसपा से बलिहारी बाबू भी यहां से टिकट के दावेदार हैं। इसके अलावा सपा के बेचई सरोज पिछले चुनाव में यहां रनर रहे थे। वह भी चाहते हैं कि गठबंधन होने की स्थित में लालगंज सीट सपा के खाते में जाये और उन्हें एक बार फिर मौका मिले। चर्चा तो यहां तक है कि पिछले चुनाव के पूर्व सपा छोड़ भाजपा में आने पूर्व सांसद दारोगा प्रसाद सरोज बीजेपी से टिकट न मिलने और रमाकांत यादव की सपा में वापसी होने की स्थित में खुद भी साइकिल पर सवार हो सकते है। ऐसी हालत में वे भी टिकट के दावेदार हो जाएंगे।
रहा सवाल कांग्रेस का तो उसका बहुत बड़ा जनाधार नहीं है लेकिन यहां भी टिकट के दावेदार कम नहीं है। विधानसभा चुनाव 2017 में सपा-कांग्रेस गठबंधन में कांग्रेस अपना वोट सपा में शिफ्ट नहीं करा पाई थी जिसका फायदा बीजेपी को मिला था। इस बार भी यह खतरा बना हुआ है। गठबंधन की कुर्सी की लड़ाई, नाताओं की महत्वाकांक्षा बीजेपी को अपने लिए फायदेमंद दिख रही है। यह बात राजनीति के जानकार भी मान रहे हैं कि कुर्सी दावेदार कभी नहीं चाहेंगे कि उनका विरोधी जीते और आगे के लिए उनके सामने परेशानी खड़ी हो। इसलिए वे पिछले चुनावों की तरह फिर भीतरघात कर सकते हैं।
By- Ranvijay Singh
Published on:
04 Jun 2018 09:46 am
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