
प्रतिमा निर्माण में जुटे कलाकार
पत्रिका न्यूज नेटवर्क
आजमगढ़. नवरात्र करीब आने के साथ ही दुर्गा पूजा की तैयारियां तेज हो गई हैं। बंगाल के कारीगर देवी देवताओं की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। निर्माण सामग्री के दामों में तो वृद्धि के बाद भी प्रतिमाओं के दामों में वृद्धि नहीं हुई है। प्रतिमा बनाने वाले कारीगरों का दावा है कि महंगाई के कारण कारोबार पर बुरा असर पड़ा है। उनके लिए लागत निकालना मुश्किल हो रहा है। फिर भी उन्होंने कोशिश की है कि कम कीमत में बेहतर प्रतिमा तैयार कर भक्तों को उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने पांच हजार से लेकर 40 हजार रुपये तक की प्रतिमाएं तैयार की हैं। वैसे महंगाई के बाद भी प्रतिमाओं के आर्डर में कमी नहीं आई है।
बता दें कि जिले के रानी की सराय, पल्हनी सहित तमाम क्षेत्रों में प्रतिमाओं का निर्माण होता है। बंगाल के कारीगर चार महीनें से प्रतिमा तैयार करने में जुटे है। पर्व से पहले प्रतिमाओं का निर्माण कार्य पूर्ण हो सके, इसके लिए कारीगरों के हाथ तेजी से चल रहे हैं। प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने में कारीगर जुट गए हैं। मूर्ति के निर्माण में लगे पश्चिम बंगाल के राज कुमार ने बताया कि प्रतिमा निर्माण में सिर्फ परिवार ही नहीं बल्कि पांच अन्य कारीगरों को लगाया गया है। मौजूदा समय में कुल 100 प्रतिमा बनाई गई हैं, जिसमें से 95 की बुकिंग हो चुकी है। सभी प्रतिमाओं के निर्माण में कुल 13 ट्राली मिट्टी लगी है। प्रतिमा निर्माण में लगने वाले सामग्रियों के दाम में तो वृद्धि हुई, लेकिन प्रतिमा के दाम में उस अनुपात में काफी कम वृद्धि की गई है। पिछले वर्ष की तरह इस बार भी 5 हजार से 40 हजार रुपये तक की प्रतिमाओं का निर्माण किया जा रहा है। प्रतिमा निर्माण के सामन के दाम में बढ़ोतरी नहीं होने से सिर्फ लागत ही निकल पाती है। 27 सितंबर से मूर्तियों के उठान का कार्य प्रारंभ हो जाएगा।
वहीं राजेश पाल, त्रिवेणी कुमार का कहना है कि करीब आठ दर्जन प्रतिमाओं का निर्माण उन्होंने किया है। इनमें से ज्यादातर का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है। उन्हें आखिरी टच देना शेष है। इसके बाद प्रतिमाओं का श्रृंगार किया जाएगा। अभी तक सभी प्रतिमाएं बुक हो चुकी है। अबकी बार प्रतिमाएं 5 हजार से 50 हजार रुपये में बिक रही हैं। निर्माण में काली व पीली मिट्टी के प्रयोग के साथ ही बांस, रस्सी आदि का प्रयोग किया जाता है। इनका मूल्य काफी बढ़ गया है। इससे हमारी परेशानी बढ़ गई है। खासतौर पर बांस और पुआल अब जरूरत के मुताबिक नहीं मिल पाए इसलिए इस बार प्रतिमाओं का निर्माण कर किया है।
मूर्ति कारीगरों का कहना है कि प्रतिमा निर्माण वे सिर्फ पैसे के लिए नहीं करते हैं। यह आस्था से जुड़ा मामला है। इसलिए हम बचत की रफ ध्यान नहीं देते है। बस दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो जाता है यही हमारे लिए काफी है। यह हमारा पुश्तैनी काम है। जब से समझदार हुए है, परिवार के बड़े बुजुर्गों के साथ सहयोग करते हुए अपने पैरों पर खड़े हो गए। नवरात्र के बाद लक्ष्मी पूजन के लिए कुछ वर्षों से प्रतिमाओं की मांग बढ़ी है। इससे हमारा रोजगार अच्छा चल जाता है।
Published on:
22 Sept 2022 12:30 pm
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