
SDM Jyoti Maurya Controversy Dalit Writer Tulsiram: यूपी के बरेली में तैनात एसडीएम ज्योति मौर्य के अधिकारी बनने के बाद बेवफा होने की खबर जमकर वायरल हो रही है। इसी बीच सोशल मीडिया पर दलित लेखक प्रोफेसर तुलसीराम भी चर्चा में आ गए हैं।
दलित लेखक तुलसी राम जेएनयू के प्रोफेसर रह चुकें हैं। बताया जा रहा है कि तुलसीराम को इस मुकाम तक पहुंचाने में उनकी पहली बीवी ने बहुत त्याग किए, लेकिन एक मुकाम हासिल करने के बाद उन्होंनेे अपनी पहली पत्नी को छोड़ दिया और दूसरी शादी कर ली।
पत्नी ने करवाई थी पढ़ाई
डॉ. तुलसीराम का बाल विवाह 2 साल की उम्र में हो गया था। 10-12 साल की उम्र में जब कुछ समझ आई तो इनका गौना हुआ। उस समय तक तुलसीराम मिडिल पास कर चुके थे। घर में विवाद होने की वजह से पढाई छोड़ने की नौबत आ गई थी। इसके बाद तुलसीराम ने अपनी नई-नवेली पत्नी राधा से गुहार लगाई कि वह अपने पिता से मदद दिलाए, जिससे उनकी आगे की पढ़ाई पूरी हो सकें। राधादेवी ने अपने नैहर जाकर यह बात अपने पिता से कही और अपने पिता से तुलसीराम को सौ रुपये दिलवाए। इस तरह पत्नी के सहयोग से तुलसीराम की आगे की पढ़ाई होने लगी।
भली बुरी सुनती अशिक्षित राधादेवी
पति आगे चलकर अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा यह सोचकर राधादेवी ने अपने सरे गहने भी उतारकर तुलसीराम को दे दिए, जिनसे आगे चलकर तुलसीराम का बनारस विश्वविद्यालय में एडमिशन हो गया। यही नहीं राधादेवीजी के मायके से प्रत्येक माह नियमित राशन-पानी भी तुलसीराम के लिए भेजा जाने लगा। इसको लेकर राधादेवी को आए दिन ससुराल में सास-ससुर देवर-जेठ और ननद-जेठानियों की भली-बुरी सुननी पड़ती थी।
तुलसीराम ने शिक्षित युवती से कर ली दूसरी शादी
कुछ समय बाद शहर की हवा खाए तुलसीराम का मन अब राधादेवीजी से हट गया। बीएचयू के बाद उच्चशिक्षा के लिए तुलसीराम ने जेएनयू दिल्ली चले गए, जहा उन्होंने यूनिवर्सिटी में पढ़ाई और रिसर्च पूरा किया और प्रोफ़ेसर बन गए। प्रोफ़ेसर बनने के बाद तुलसीराम ने राधादेवी को बिना तलाक दिए अपने से उच्चजाति की शिक्षित युवती से शादी कर लिया और फिर मुड़कर कभी अपने गाँव और राधादेवी की ओर नहीं देखा।
आज दाने-दाने को मोहताज हैं राधादेवी
कुछ साल पहले तुलसीराम का निधन हो गया। इसमें राधादेवी के देवर-जेठ अंतिम संस्कार में दिल्ली जाकर शामिल हुए थे, पर राधादेवी को ना ही ले गए और ना ही उन्हें कुछ बताया। बहुत दिनों बाद उन्हें इस बात की खबर हुई कि अब वो विधवा हो गई है। इसके बाद वो बीमार रहने लगीं और अब वृद्ध हो चली हैं। बेघरबार राधादेवी आज ससुराल और मायके के बीच झूलतीं दाने-दाने को मोहताज़ हैं। प्रोफेसर तुलसीराम हिंदी के मूर्धन्य लेखक 'मुर्दहिया' और 'मणिकर्णिका' जैसी प्रसिद्ध आत्मकथाओं के रचनाकार हैं।
ये स्टोरी मिश्रा राजीवरंजन ने लिखी है। राजीव पत्रिका उत्तर प्रदेश के साथ इंटर्नशिप कर रहे हैं।
Published on:
05 Jul 2023 04:59 pm
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