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दो खेमों में बंट चुकी है सपा, कहीं गुटबंदी डूबो न दे पार्टी की लुटिया 

एक वरिष्ठ मंत्री को दरकिनार करने की रणनीति ने किया बंटाधार

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Ahkhilesh Tripathi

Sep 14, 2016

akhilesh, mulayam and shivpal

akhilesh, mulayam and shivpal

आजमगढ़. विधानसभा चुनाव-2012 में समाजवादी पार्टी जनपद में ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था। विधानसभा की दस में से नौ सीटों पर कब्जा कर समाजवादी पार्टी ने अपने विरोधियों को चारो खाने चित कर दिया था। वहीं आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी का अपने पुराने प्रदर्शन को दोहरा पाना टेढ़ी खीर बन चुका है। जनपद में पूरी पार्टी दो खेमों में बट चुकी है। एक वरिष्ठ मंत्री को दरकिनार करने की योजना ने समाजवादी पार्टी की ताकत को कमजोर कर दिया है। अगर समय रहते पार्टी की रणनीतिकारों ने डैमेज कंट्रोल नही किया तो 2017 के चुनाव में सपा की लुटिया डूबनी तय है।


जनपद की राजनीतिक आबो हवा समाजवादी आंदोलन के मुफीद रही है। इसका नजारा वर्ष 2012 के विधानसभा चुनावों में देखने को मिला । पार्टी ने जनपद की दस में से नौ सीटों पर कब्जा करके यह संदेश दिया कि आजमगढ़ सचमुच में समाजवादियों का गढ़ है। कहते हैं न सत्ता का सुख ऐसा है जिसमें कई बार अपने पीछे छूट जाते हैं। समाजवादी पार्टी जो संघर्ष के समय एक जुट थी सत्ता मिलते ही निजी स्वार्थो के भंवर में ऐसी फंसी कि पार्टी की नीतियां पीछे छूट गई। जनपद के वरिष्ठ नेताओं में इस कदर कांट छाट मची कि आज पूरी पार्टी दो खेमों में बट चुकी है। विधानसभा में प्रदर्शन के आधार पर सदर विधायक दुर्गा प्रसाद यादव पहली बार कैबिनेट मंत्री बनाये गये।


वहीं विधान परिषद सदस्य पूर्व मंत्री बलराम यादव को मुलायम सिंह के करीबी होने का लाभ मिला और वह मंत्री बन गये। बलराम की दावेदारी ऐसे भी थी कि उनके बेटे डा. संग्राम यादव विधायक चुने गये थे। बलराम यादव समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में शुमार किये जाते हैं। इनके अतिरिक्त वसीम अहमद को भी राज्यमंत्री बना दिया गया। ईमानदार नेताओं की पंक्ति में गिने जाने वाले आलमबदी जिसके लिए मुलायम सिंह ने कहा था कि मुझे आलमबदी जैसे फकीर की जरूरत है, को सत्ता मिलते ही मंत्री पद के लायक नही समझा गया। इनके अतिरिक्त आधा दर्जन नेताओं को राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया।


समाजवादी पार्टी की सत्ता में आने के बाद उसके लिए पहली परीक्षा थी वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव। लोकसभा चुनाव की टिकट को लेकर समाजवादी पार्टी की गुटबंदी सतह पर आ गई। राजनीति की खबर रखने वालों की माने तो समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष हवलदार यादव जो पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष पद पर रह चुके हैं पार्टी की ओर से लोकसभा चुनाव में सदर सीट से टिकट चाहते थे। उन्हे बलराम यादव का खास माना जाता था। इसके लिए वह प्रयास भी कर रहे थे। तब बलराम यादव पंचायती मंत्री और जिला पंचायत अध्यक्ष पद हवलदार यादव की पुत्रवधु मीरा यादव के पास था। कई मामलों में जब हवलदार यादव बलराम यादव से कटे-कटे नजर आये तो कहा जाता है कि बलराम यादव ने उनकी पैरोकारी छोड़ दी। इसी बीच बलराम यादव को पार्टी ने लोकसभा सदर से प्रत्याशी घोषित कर दिया। सदर सीट दुर्गा यादव के प्रभाव की सीट मानी जाती है।



ऐसे में अंदर खाने की रिपोर्ट के आधार में बलराम ने चुनाव में अपनी स्थिति जान ली उन्हे पार्टी के बाहर ही नहीं अंदर भी लड़ना होगा। इधर हवलदार यादव को लगा कि बलराम यादव ने उन्हे टिकट न दिलवाकर खुद टिकट ले लिया। इस पर वो नाराज हो गये । पार्टी में दुर्गा व हवलदार एक गुट व बलराम यादव का एक अलग गुट बन गया। तभी पार्टी ने हवलदार यादव को प्रत्याशी घोषित कर दिया। हवलदार यादव ने चुनाव की तैयारी में करोड़ो रूपये फूंक दिये। कहा जाता है कि हवलदार के टिकट की घोषणा बलराम ने ही करवाई थी ताकि वह आर्थिक रूप से कमजोर हो सके। चुनाव की तैयारियों में जुटे हवलदार उस समय तिलमिलाकर रह गये जब अचानक से पार्टी ने उनका टिकट काट दिया तथा मुलायम सिंह के आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की घोषणा हो गई।



कहा जाता है कि मुलायम को आजमगढ़ से चुनाव लड़ने की पैरोकारी बलराम ने जबरदस्त तरीके से की थी। करोड़ों रूपया फूंकने वाले हवलदार इस घोषणा का विरोध भी नही कर सके। उन्हे नेताजी के चुनाव लड़ने का स्वागत भी करना पड़ा। राजनीतिक और आर्थिक रूप से चोट खाये हवलदार और दूर्गा ने बलराम के विरोध की रणनीति बनाते हुए मुख्यमंत्री को साधने की जुगत में लग गये। बलराम अपना साथ मुलायम से होने के कारण मुतमईन थे उनका कुछ बिगड़ नही सकता। लोकसभा चुनावो में समीक्षा के तुरंत बाद मुख्यमंत्री ने बलराम का मंत्री पद छीन लिया और पंचायती मंत्री की अपेक्षा कम महत्व का मंत्री पद कारागार मंत्री बना दिया।


यहीं से मुख्यमंत्री की निगाह में बलराम यादव का ग्राफ गिरने लगा। कई बार विधायकों की खेमेबंदी कर मुख्यमंत्री के यहां बलराम के खिलाफ पेश किया गया। जब विरोध तेज हुआ तो बलराम शांत हो गये। कुछ दिनों के बाद बलराम की योगिनी वापस हुई और वह माध्यमिक शिक्षा मंत्री बन गये। उनका रूतबा लौट आया तभी राज्य सभा चुनाव में कौमी एकता दल के वोट लेने और उसके विलय के रणनीतिकार के रूप में बलराम यादव आगे आये। कौमी एकता दल के विलय की सहमति उन्हे मुलायम सिंह यादव और शिवपाल से मिली थी। कौमी एकता दल के विलय की घोषणा हो गई परंतु तभी मुख्यमंत्री को समझा दिया गया कि इससे पार्टी की छवि पर बुरा असर पड़ेगा और मुख्यमंत्री ने विलय को रद कर दिया। मुख्यमंत्री ने बलराम को मंत्रीपद से बर्खास्त कर दिया। मीडिया के सामने बलराम पार्टी की सेवा का हवाला देकर रो पड़े।


मुलायम ने यह कहकर मुझसे पूछकर बलराम ने कौमी एकता दल का विलय कराया था बलराम का बचाव किया। नेता जी के हस्तक्षेप के बाद बलराम यादव दुबारा मंत्री पद पा तो गये लेकिन मुख्यमंत्री के दिल में जगह नही बना सके। बलराम मुख्यमंत्री के यहां से दरकिनार होने का कारण विरोधी खेमे को मानते हैं। आज पार्टी हर विधानसभा में दो गोल में बटी है एक बलराम और दूसरा हवलदार और दुर्गा की। यह गुटबंदी पार्टी के लिए आगामी विधानसभा चुनावों में महंगी साबित होने वाली है। पार्टी में अंदरूनी फूट पड़ी हुई है। ऐसे में क्या समाजवादी पार्टी 2012 का ऐतिहासिक प्रदर्शन दोहरा पायेगी यह सवाल यक्ष प्रश्न बना है।

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