
सूरजमुखी
आजमगढ़. खराब मौसम के चलते अगर आलू और दलहनी फसलों को नुकसान पहुंचा है और लगता है कि लागत नहीं निकल पाएगी तो किसान सूरजमुखी की खेती कर नुकसान की भरापाई कर सकते है। सूरजमुखी की खेती आर्थिक और स्वास्थ्य दोनों दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। देश में खाद्य तेलों की उपलब्धता प्रति व्यक्ति 8.1 किग्रा है जो मानक से काफी कम है। सरसों में यूरिसिक अम्ल 47 प्रतिशत होता है। ऐसे तेल जिसमें मल्टी असंतृप्त वसीय अम्ल का प्रतिशत अधिक होता है। वे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं। सूरजमुखी में 40 प्रतिशत तेल तथा 42 से 44 प्रतिशत उच्च गुणवत्ता की प्रोटीन पायी जाती है। प्रकाश के प्रति संवेदनशील होने के कारण इसे किसी भी मौसम में उगाया जा सकता है। फसल 95 से 100 में तैयार हो जाती है। ऐसे में यह फसल कम समय में अच्छा उत्पादन देती है। इससे आर्थिक लाभ तो होता ही है इसका उपयोग स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है।
प्रजातियां
कृषि विज्ञान केन्द्र कोटवां के सस्य वैज्ञानिक डॉ. आरके सिंह एवं उपनिदेशक उद्यान एके सिंह के मुताबिक केबीएसएच-1, एमएसएफएच-8, पीएसी-3435, राजा 5026, जेकेएसएफएच- 2001, सनग्रो-95, पीएसएच-50, एनएसएच-169 तथा जेएसएच-26 सूर्यमुखी की प्रमुख संकर किस्में हैं।
बोआई का समय व बीज की मात्रा
संकर बीज छह से सात किलोग्राम प्रति हेक्टेअर पर्याप्त होता है। बोआई का सर्वोत्तम समय फरवरी के दूसरे पखवारे से लेकर मार्च का प्रथम सप्ताह है। फसल मई के अंत तक अथवा जून के प्रथम सप्ताह तक पककर तैयार हो जाती है। सूरजमुखी की बोआई लाइन में 60 सेमी तथा पौधों के बीज की दूरी 20 सेमी होनी चाहिए। बोआई के 20 से 25 दिन के बाद निराई कर अतिरिक्त पौधों को बाहर निकाल देना चाहिए।
बीज शोधन
बोआई के पूर्व बीज को 12 घण्टे पानी में भिगायें फिर उसे छानकर तीन-चार घण्टे छाया में सुखायें। इसके बाद कैप्टान अथवा ब्रासिकोल की 2 ग्राम या थायरम तीन ग्राम दवा को 1 किलोग्राम बीज में मिलाकर उपचारित करें। इसके बाद बीज को रात भर पानी में भिगाकर अगले दिन बोआई करें। इससे जमाव अच्छा होगा।
उर्वरक प्रबन्धन
सूरजमुखी के लिए 80,60,40 किलोग्राम नत्रजन, फास्फोरस एवं पोटास की प्रति हेक्टेअर आवश्यकता होती है। फसल बोआई के पूर्व 250 किग्रा जिप्सम प्रति हेक्टेअर की दर से खेत में मिलायें। इसके बाद नत्रजन की आधी फास्फोरस एवं पोटास की पूरी मात्रा बोआई के समय छिड़काव करें। नत्रजन का बचा भाग बोआई के 25-30 दिन बाद अथवा सिंचाई के बाद टाप ड्रेसिंग करें। बीज में तेल बढ़ाने के लिए 0.2 प्रतिशत बोरेक्स घोल का छिड़काव करें।
सिंचाई
सूरजमुखी की फसल को चार-पांच सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है। पहली सिंचाई बोआई के 20 से 25 दिन बाद, दूसरी कली बढने की अवस्था में, तीसरी फूल बनने के 20 दिन बाद करनी चाहिए। इसके बाद खेत की नमी को देखते हुए सिंचाई करें। ध्यान रहे कि बीज बनते समय खेत में पर्याप्त नमी का होना जरूरी है।
फसल सुरक्षा
दीमक व कटुआ कीटः बीज जमाव के बाद कटुआ सुण्डी मार्च महीने में रात के समय पौधों को काटते हैं। इनसे बचाव के लिए तीन-चार लीटर डर्सवान (क्लोरपायरीफास) प्रति हेक्टेअर बालू में मिलाकर खेत में बिखेर दें। इसके बाद हल्की सिंचाई करें।
हरे फुदकेः इस कीट के प्रौढ़ तथा बच्चे पत्तियों का रस चूसते हैं। इन पर नियंत्रण के लिए क्यूनासफास 1.5 लीटर अथवा एक लीटर इन्डोसल्फान प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करें।
अमेरिकन बार वर्मः हीलियोथिस अर्मीजेराकीट का प्रकोप मुण्डकों के बीज भराव के समय होता है। इसके कैटरपिलर बीजों को खाते हैं। इसके नियंत्रण के लिए 1.5 लीटर क्यूनालफास या 1.25 लीटर इन्डोसल्फान प्रति हेक्टेअर 600 से 700 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
रोग नियंत्रण
झुलसा रोगः यह रोग फफूद से होता है। पत्ती के ऊपरी सतह पर काले या भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं। बाद में यह टण्ठल पर दिखाई देते हैं। इस पर नियंत्रण के लिए 2 किलोग्राम इण्डोफिल एम-45 प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करें।
स्केलेरोटीनिया विल्टः यह रोग फफूद से होता है। पौधा मुरझाकर सूखने लगता है। रोग का आक्रमण बीज अंकुरण के समय सही हो जाता है। इससे बचाव के लिए फसल पर बोनोमाइल का छिड़काव करें।
चिडियों से बचाव
चिड़िया भगाने के लिए वर्ड स्केरर का प्रयोग करना चाहिए या चमकीले विशेष कर लाल रंग के टीन का पतला-पतला पत्ती नुमा भाग खम्भे में बांध कर फसल के बीचोबीच गाडना चाहिए।
By Ran Vijay Singh
Published on:
30 Jan 2020 12:03 pm
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