
अखिलेश यादव
यूपी निकाय चुनाव 2022 राजनीतिक दलों के लिए अग्निपरीक्षा है। कारण कि इसे 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा है। ऐसे में सबकी नजर बड़ी जीत हासिल करने पर है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या पहली बार अपने गढ़ आजमगढ़ में सपा नगरपालिका अध्यक्ष की कुर्सी हासिल कर पाएगी। अब तक सीट पर सपा का खाता नहीं खुला है। हाल में उसे लोकसभा उपचुनाव में भी हार मिली है। ऐसे में पार्टी की चुनौती और बढ़ गई है।
सपा-बसपा का गढ़ रहा है आजमगढ़
अस्तित्व में आने के बाद से ही सपा और बसपा ने आजमगढ़ पर राज किया है। पहला मौका है जब आजमगढ़ में बसपा का कोई विधायक नहीं है। सपा ने 2022 में सभी दस विधानसभा सीटों पर कब्जा जमाया है। यह दूसरा मौका है जब जिले में सपा का काई सांसद नहीं है। इससे पहले 2009 में सपा को जिले की दोनों लोकसभा सीटों पर हार का सामना करना पड़ा था।
जिसे मिली ज्यादा सीट उसे मिली सत्ता
2017 से पहले विधानसभा चुनाव में सपा या बसपा में से जिस पार्टी को आजमगढ़ में अधिक सीट मिली उसे यूपी की सत्ता मिली है। वर्ष 2007 में बसपा यहां छह सीट जीती और उसे यूपी में पूर्ण बहुमत मिला। वर्ष 2012 में सपा दस में से नौ सीट पर जीत हासिल की और अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री बन गए।
वर्ष 2014 की मोदी लहर में जीते मुलायम, बसप को लगा था झटका
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पूर्वांचल में विपक्ष का सूपड़ा साफ हो गया था लेकिन आजमगढ़ सीट से सपा मुखिया मुलायम सिंह सांसद चुने गए थे। वहीं लालगंज सीट जो बसपा के पास थी वहां बीजेपी की नीलम सोनकर ने जीत हासिल की थी। सीट पर बीजेपी की पहली जीत थी। वहीं आजमगढ़ में सपा का दबदबा कायम था। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में योगी लहर के बाद भी आजमगढ़ में सपा को पांच, बसपा को चार और बीजेपी को मात्र एक सीट मिली थी।
2019 में अखिलेश चुने गए सांसद
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ सीट से अखिलेश यादव व लालगंज सीट से बसपा की संगीता आजाद सांसद चुनी गई। दोनों ही सीटों पर भाजपा को निराशा मिली। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने सभी दस सीटों पर जीत हासिल की। बसपा का खाता नहीं खुला।
2022 में पहली बार हारा मुलायम का परिवार
अखिलेश यादव द्वारा संसदीय सीट से त्यागपत्र देने के बाद आजमगढ़ सीट पर उपचुनाव हुआ। अखिलेश यादव ने अपने चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को मैदान में उतारा। वहीं भाजपा ने फिल्म स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ और बसपा ने गुड्डू जमाली पर दाव खेला। इस चुनाव में बड़ा उलटफेर हुआ बीजेपी ने 10 हजार के अंतर से सीट जीत ली।
सपा का नगपालिका में आज तक नहीं खुला खाता
सपा ने हमेशा लोकसभा और विधानसभा चुनाव में आजमगढ़ पर राज किया लेकिन आज तक सपा को नगरपालिका अध्यक्ष की सीट पर जीत नहीं मिली। उपचुनाव में हार के बाद अब पार्टी की चुनौती और भी बढ़ गई है। सपा जिताऊ प्रत्याशी की तलाश में जुटी हुई है।
सपा के सारे दाव हुए फेल
निकाय चुनाव पर सपा ने वोट की गणित को देखते हुए तीन चुनाव में मुस्लिम प्रत्याशी वसिउद्दीन पर दाव खेला लेकिन पार्टी को जीत नहीं मिली। इसके बाद पार्टी ने वर्ष 2017 में व्यपारी नेता पदमाकर लाल वर्मा पर दाव लगाया लेकिन यह दाव भी फेेल हो गया। अब पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती ऐसे प्रत्याशी का चयन है जो शहरी मतदाताओं को लुभा सके।
ध्रुवीकरण रहा सपा की हार का कारण
अब तक जितने भी चुनाव हुए है वर्ष 2017 के चुनाव को छोड़कर सपा को हमेंशा ध्रुवीकरण के कारण नुकसान उठाना पड़ा है। इस चुनाव में भी सपा से सबसे अधिक दावेदारी उन्हीं नेताओं की है जिनके मैदान में आने से ध्रुवीकरण का खतरा है। वहीं वर्तमान नगर पालिका अध्यक्ष बीजेपी का साथ छोड़कर सपा के खेमे में न केवल खड़ी हो गई हैं बल्कि टिकट भी मांग रही है। ऐसे में पार्टी के लिए असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है।
क्या कहते हैं राजनीति के जानकार
राजनीति में अच्छी पकड़ रखने वाले रामजीत सिंह, प्रोफेसर रणजीत सिंह का कहना है कि निकाय चुनाव लोकसभा और विधानसभा से अलग होता है। निकाय चुनाव में स्थानीय मुद्दे हाबी होते हैं। अब तक के जितने भी चुनाव हुए हैं उसमें 2017 को छोड़ दे तो सपा हमेशा मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ समेटकर रखने के लिए इसी वर्ग के लोगों पर दाव लगाती थी। इसके कारण विपक्ष को ध्रुवकरण का मौका मिलता था।
वर्ष 2017 में जनता ने निर्दल पर फोकश किया। शीला श्रीवास्तव के साथ सहानुभूति थी। जिसके कारण वे मामूली अंतर से जीत गई लेकिन जिस तरह से भारत रक्षा दल के प्रत्याशी हरिकेश विक्रम श्रीवास्तव सप, बसपा और भाजपा को पछाड़कर दूसरे स्थान पर पहुंचे उसका साफ संदेश था कि जो जनता की बात करेगा। वह उसके साथ खड़ी होगी। इस चुनाव में सपा ही नहीं बल्कि सभी दलों को जीत के लिए ऐसे चेहरे की जरूरत होगी जो जनता के बीच का हो।
Published on:
21 Nov 2022 03:10 pm
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