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घर को तीर्थ बनाए बिना सब व्यर्थ है-राष्ट्रसंत ऋषि प्रवीण

नूतनकला निकेतन में शुुरू हुई प्रवचन माला की श्रंखला

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घर को तीर्थ बनाए बिना सब व्यर्थ है-राष्ट्रसंत ऋषि प्रवीण

घर को तीर्थ बनाए बिना सब व्यर्थ है-राष्ट्रसंत ऋषि प्रवीण

बालाघाट. हर व्यक्ति के सोच में रहता है कि जिंदगी में कुछ पाना ही जीवन है और संपूर्ण साधना अपनी पाने के लिए ही चलती है। कमठ ने बहुत बभूत रमाई और सभी ड्रामें बड़े प्यार से किए। लेकिन मन के भीतर का कलमश साफ नहीं कर पाए। बहुत साधना की और तपस्या भी की, लेकिन कमठ बदल नहीं पाया। उक्ताशय के विचार अर्हम विज्जा प्रणेता ऋषि प्रवीण महाराज ने रविवार को प्रवचन माला की श्रंखला में पारस कथा के तीसरे दिन रखें। 26 दिसंबर से राष्ट्रसंत प्रवीण ऋषि मसा और तीर्थेश ऋषि मसा के प्रवचन का आयोजन नगर की सांस्कृतिक संस्था नूतनकला निकेतन परिसर में आयोजित की गई। यहां पर सर्वसमाज, सकल जैन समाज के संयुक्त प्रयासों से सर्वसमाज के लोग भगवान पाश्र्वनाथ कथा के प्रसंग का श्रवण कर रहे है।
ऋषि प्रवीण ने पारस कथा की श्रंखला में आगे कहा कि आज से दो पाठयक्रम चलने है। एक का विषय होगा भगवान पाश्र्वनाथ की कथा और दूसरा विषय होगा आपके परिवार के पाश्र्वनाथ का। मरूभूति के पाश्र्वनाथ बनने की कथा के साथ आपका परिवार भी पाश्र्वनाथ बन जाए। आपकी हर श्वास में पाश्र्वनाथ समा जाए। परिवार आपके साथ है तो जीत आपकी पक्की है अगर परिवार आपके साथ नहीं है तो हारना निश्चित है। आप परिवार प्रिय हो, आप परिवार से करूणा रखते हो तो प्रभु से प्यार आराम से हो जाएगा और परिवार में प्रिय नहीं हो, परिवार से प्यार नहीं करते हो तो प्रभु का प्यार भी तुम्हारा कमठ जैसे हो जाएगा। मेरी बात उन लोगों को कभी हजम नहीं होगी, जिन्होंने धर्म उसको समझा है जहां परिवार का प्यार नहीं होता है, केवल प्रभु का प्यार होता है। उन्होंने आगे आशीर्वाद के संदर्भ में बताया कि उसने नमन नहीं किया है, उसने प्रणाम नहीं किया है और आपने आशीर्वाद दिया तो आप भगवान हो गए हो। आशीर्वाद पहले होना चाहिए कि प्रणाम पहले होना चाहिए। ऐसे आशीर्वाद दो कि सामने वालों का सिर झुके बिना रह ही न सके। ये क्या शर्त है तुम्हारी कि तु सर झुकाएगा तो मै आर्शीवाद दूंगा। तु कीमत देगा तो मै माल दूंगा यह तो व्यापार हो गया। मै उस प्रभु महावीर के साथ जीता हूं कि जिसने चंडकोशी को आशीर्वाद दिए जो उनको प्रणाम नहीं कर रहा था, उनको कांट रहा था। इसलिए वो प्रभु बन गए। इसलिए परिवार को शक्तिपीठ बनाने की यात्रा शुरू की मैने। अगले पांच दिन जो बात मुझे करनी है वो परिवार की होगी। मेरे गुरू का एक अरमान है घर तीर्थ, सब तीर्थ, घर तीर्थ बिना सब व्यर्थ है। घर मंदिर, हर ठौर मंदिर, घर मंदिर के बिना हर ठौर खंडहर है। इसलिए आप कल्पना करों तो जरूर करों कि घर मंदिर हो जाए तो क्या होगा। इसके अलावा उन्होंने अमृतमयी ज्ञान की गंगा का रसपान उपस्थित लोगों को कराया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।