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हैप्पी बर्थडे बालाघाट, पूरे १२२ वर्ष का हुआ बालाघाट

१२३ वें वर्ष में करेंगा प्रवेश, १२ घाट से घिरे होने के कारण पड़ा यह नाम

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बालाघाट. वैनगंगा नदी की गोद में बसे बालाघाट जिले को बालाघाट बने हुए आज ३१ दिसंबर को पूरे १२२ वर्ष हो गए हैं। इस लम्बे समय में बूढ़े मगर जवान बालाघाट में अधिकांश चीजे अग्रेंजों की दी हुई है। इतिहास के जानकार विकास, शिक्षा के क्षेत्र में पुरातन से लेकर अब तक के समय को याद करते हैं। जिले को स्वतंत्र भारत से ज्यादा कुछ नहीं मिला। समय बीतता गया और विकास के वादें कागजों तक रह गए। इसलिए जिला आज वन, खनिज सम्पदा होने के बाद भी पिछड़ों के सूची में अव्वल होने को आमदा है। इसके बाद भी हम कहते हंै बालाघाट बहुत अच्छा जिला है, शांत है यहां के लोग बहुत मिलनसार है जो बालाघाट आता है वह यहीं का होकर रह जाता है।
यह बालाघाट का इतिहास
ब्रिटिश शासन काल के डिप्टी कमिश्नर कर्नल ब्लूम फिल्ड को बालाघाट का जनक कहा जाता है। कर्नल ने इस बात को भाप लिया था कि बालाघाट को जिला बनाए जाने से आस-पास के क्षेत्रों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखा जा सकता है। इस कारण इसे जिला बनाए जाने की योजना रखी गई। सीपी एण्ड बरार (सेन्ट्रल प्रोविनसेस एण्ड बरार) के अंतर्गत भंंडारा जिला में था। जिसकी राजधानी नागपुर हुआ करती थी।
इस समय १ जनवरी १८९५ में बालाघाट को जिला बनाया गया। जिसमें बैहर, लांजी, वारासिवनी तीन तहसील बनाई गई। इसके बाद अवश्यकता के अनुसार तहसीलों का विस्तार किया गया। वर्ष १९५६ में स्वंतत्र मध्य प्रदेश की स्थापना के समय बालाघाट मप्र में शामिल हुआ। जानकारोंं के अनुसार १२ घाटो से घिरे होने के कारण इसका नाम १२ घाट रखा जाना था। नामकरण के लिए यह कलकत्ता गया था, जहां पर उच्चारण की गलती होने के कारण १२ घाट के स्थान पर बालाघाट नाम हो गया। सुघार नहीं होने के कारण १२ घाट बालाघाट बन गया।
इतिहास की बातें
सिख समाज के जानकरों के अनुसार इनके पहले गुरू श्री गुरुनानक देवजी १५ सौ से १५५० ई. के बीच बालाघाट होकर गुजरे थे। इस बात का प्रमाण उनके विश्व भ्रमण के नक्से में अंकित है। स्वतंत्रता संग्राम के जानकारी रखने वालों के अनुसार गांधीजी अछूत समानता अधिकार आंदोलन के लिए धन एकत्रित करने के लिए आमगांव, कारंजा के रास्ते रजेगांव होते हुए बालाघाट से होकर गुजरे थे। इसके अलावा कहावत यह भी है कि रामपायली में वनवास के दौरान भगवान रामचंद्र जी पत्नी सीता और लक्ष्मण के साथ आए थे। जिसके कुछ प्रमाण भी मिलते हंै।
प्रमुख घटना
२० फरवरी १९७५ में हुए थाना कांड की वजह से बालाघाट को देश के नक्शे में जाना जाने लगा। इसके बाद सन् १९८३-८४ में मौत की ट्रेन के नाम से पहचाने जाने वाला नाहरा पुल कांड जिसमें ट्रेन चार बोगी पुल से नदी में गिर जाने के कारण सौ से अधिक लोग की मौत के काल में समा गए। सन् १९९२ से २०१३ के बीच नक्सलवाद के कारण हत्या, घटनओं के कारण बालाघाट चर्चा में रहता है। इसके अलावा वर्तमान में चल रही फर्जी टीपी से वनोपज कांड, आरटीओ फर्जीवाड़ा ऐसे प्रकरण है जिससे जिले का नाम चर्चाओं में रहने के साथ ही जिले की छवि भी धुमिल हो रही है।
प्रमुख व्यक्ति
जिले के तीन प्रमुख व्यक्ति के रुप में बालाघाट के जनक कर्नल ब्लूम फिल्ड, मानेक मेरवान जी मुलान जिनको दीवान बहदुर एमएम मुलना साहाब के नाम से जाना जाता है। इनके द्वारा दिए गए दान पर बालाघाट का स्टेडियम, पॉलीटेक्निक कॉलेज, पुराना फिल्टर प्लांट आज भी लोगों को सुविधा प्रदान कर रहा है। तीसरे व्यक्ति जटाशंकर जी त्रिवेदी जिनकी स्मृति में इनके परिजनों ने कालेज भवन शासन को दान दिया जो आज जिला का सबसे बड़ा कॉलेज है।
१०० वर्षो में स्वयं का कुछ नहीं
राज्य और केन्द्र स्तर पर जनता ने प्रतिनिधि तो भिजवा दिए। लेकिन आज भी हम अग्रेंजों द्वारा दिए हुए उपहार का लाभ ले रहे हैं। जिसमें गांगुलपारा, ढूटी, टेकाड़ी, जमुनिया जलाशय, बालाघाट से जबलपुर नैरोगेज जो अब ब्राडग्रेज बनने जा रही है, उत्कृष्ट और महात्मा गांधी स्कूल, एसपी कार्यालय, कोर्ट भवन, विश्राम गृह से लेकर आधा दर्जन से अधिक पुल तक ब्रिटिश शासन काल की देन है। शर्म की बात तो यह है कि सड़क निर्माण के अलावा कहने को महज बालाघाट से गोंदिया और कटंगी ब्राडगेज ही दे सके हैं।