
Teachers Day: सैलरी के आठ लाख खर्च कर सरकारी स्कूल को बनाया डिजिटल, मनोरोगियों की नि:स्वार्थ सेवा करते हैं ये टीचर
बालोद. शिक्षक समाज के रोशन अपने ज्ञान से रोशन करते हैं। हमारे जिले में भी कई ऐसे शिक्षक हैं, जिन्होंने विद्यार्थियों की पढ़ाई के साथ स्वयं के खर्च से सरकारी स्कूल को भी संवार दिया। शिक्षक मनोरोग छात्र-छात्राओं की नि:शुल्क सेवा भी कर रहे हैं। इन शिक्षकों की सेवाभाव की पूरा जिला प्रशंसा कर रहा है।
डिजिटल स्कूल बनाकर प्रदेश में बनाई अलग पहचान
शिक्षक ईश्वरी प्रसाद सिन्हा देश, छत्तीसगढ़ और जिले में पहचान के मोहताज नहीं है। अपनी मेहनत व लगन से स्कूल को ही संवर दिया। स्कूल को डिजिटल स्कूल बनाकर प्रदेश में अलग पहचान बनाई है। गुरुर विकासखंड के ग्राम चिटौद के प्राथमिक शाला में पदस्थ शिक्षक हैं। अपने 13 साल के शिक्षकीय कार्य में उन्होंने अपने वेतन के लगभग 8 लाख रुपए स्कूल की साज-सज्जा और स्कूल को डिजिटल बनाने में खर्च कर दिए। इस स्कूल में प्रोजेक्टर, लाउडस्पीकर, टेलीविजन, लैपटॉप और टेबलेट के सहारे पढ़ाई होती है। किताबी शिक्षा के साथ साथ डिजिटल शिक्षा को देखने अन्य जिले के शिक्षक भी आते हैं। इस स्कूल का आस्ट्रेलिया के नागरिकों ने भी निरीक्षण किया है। कलेक्टर, शिक्षा अधिकारी ने भी स्कूल की प्रशंसा की।
बेहतर कार्य करने की वजह से मिला राष्ट्रपति से सम्मान
अपने बेहतर कार्य की वजह से शिक्षक ईश्वरी प्रसाद सिन्हा को राष्ट्रपति से राष्ट्रपति शिक्षक सम्मान, राज्यपाल शिक्षक सम्मान सहित कई नेशनल और जिला स्तर पर भी सम्मान मिल चुके है। उन्होंने कहा जब तक वह हैं, तब तक शिक्षा व स्कूल के विद्यार्थियों के प्रति उत्कृष्ट शिक्षा देने का कार्य
जारी रहेगा।
नि:शक्तों की संवार रहे जिंदगी
डौंडीलोहारा विकासखंड के ग्राम भरदा शासकीय हाईस्कूल के प्राचार्य उमेशचन्द्र अग्रवाल गणित की पढ़ाई के साथ नि:स्वार्थ भाव से मानसिक रोगियों की सेवा भी कर रहे हैं। वे अब तक 150 से अधिक लोगों का इलाज भी करा चुके हंै।
दिव्यांग को देख मन में आया सेवाभाव का ख्याल
प्राचार्य अग्रवाल ने बताया कि 9 साल पहले एक मानसिक रोगी को देखा तो उनका दिल पसीज गया। सोचा क्यों न, इसके लिए कुछ किया जाए। सेवाभाव में ऐसे रमा कि जहां भी मानसिक रोगी दिखते हैं, उनके पालकों से बात कर इलाज के लिए आगे आते हैं। दुर्ग के वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. शैल वर्मा के यहां रोगियों का इलाज करवाते हैं। उन्होंने बताया कि स्कूल व गांवों में जाकर ऐसे बच्चों व लोगों को चिंहित करते हैं। पालक सहमति देते हंै तो उनका इलाज भी स्वयं के खर्च से कराते हैं। मनोरोगियों की संख्या को देखते हुए (दिव्यांग, लावारिस, मनोरोगी बच्चों के लिए) धर्मार्थ आश्रम बनाने की योजना है। वे ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास, नशामुक्ति, मनोरोग के प्रति जागरुकता अभियान भी 2012 से चला रहे हैं। इसके अलावा मानव सेवा के साथ बच्चों को कला सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से बारीकी भी सिखाते हैं।
Published on:
05 Sept 2021 11:45 am
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