4 अप्रैल 2026,

शनिवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

स्वतंत्रता दिवस: एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कलम से पढि़ए, कैसी थी सन् 1947 में आजादी की वो पहली सुबह….

बालक को देखकर पड़ोस में रहने वाले भैरा केंवट ने कहा कि तोर बेटा तो हीरा सही चमकत हे। ऐसा बोलकर उसने बच्चे का नामकरण ही कर दिया। माता-पिता ने नाम रखा हीरालाल। वे एकमात्र शख्स हैं, जो स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रपति पुरस्कृत शिक्षक और विधायक भी रहे। (Balod's freedom fighter Hiralal )    

3 min read
Google source verification

बालोद

image

Dakshi Sahu

Aug 15, 2020

स्वतंत्रता दिवस: एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कलम से पढि़ए, कैसी थी सन् 1947 में आजादी की वो पहली सुबह....

स्वतंत्रता दिवस: एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कलम से पढि़ए, कैसी थी सन् 1947 में आजादी की वो पहली सुबह....

सतीश रजक @बालोद. आज पूरा देश आजादी की 74वीं वर्षगांठ मना रहा है। आजादी में बालोद जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का भी बड़ा योगदान है। बालोद सहित जिले के नारागांव, निपानी, गोडऱी व भरदा (डौंडीलोहारा) जैसे और भी अन्य गांव हैं, जहां स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने देश को आजाद कराने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। यही नहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस जैसे नेतृत्व करने वाले नेताओं के साथ मिलकर काम किया। आज इनमें से कई सेनानियों का परिवार शासन-प्रशासन की नजरों से दूर है। वे गरीबी व आर्थिक तंगी का जीवन जीने को मजबूर हैं। आजादी के इस खास पर्व में हम देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बारे बताने जा रहे हैं। उन्होंने जेल यात्रा भी की थी। ( Independence Day 2020)

विधायक थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी
डौंडीलोहारा विकासखंड की राजनांदगांव रोड पर पूर्व दिशा की ओर करीब तीन किमी की दूरी पर एक छोटा-सा गांव है भरदा। यहां के एक सामान्य किसान घनाराम साहू-ग्वालिन बाई के घर एक जनवरी 1907 को एक बच्चे का जन्म हुआ। गौरवर्ण के इस बालक को देखकर पड़ोस में रहने वाले भैरा केंवट ने कहा कि तोर बेटा तो हीरा सही चमकत हे। ऐसा बोलकर उसने बच्चे का नामकरण ही कर दिया। माता-पिता ने नाम रखा हीरालाल। वे एकमात्र शख्स हैं, जो स्वतंत्रता सेनानी, राष्ट्रपति पुरस्कृत शिक्षक और विधायक भी रहे।

जुलूस में तिरंगा लेकर चलते थे
सात-आठ साल की उम्र में मैंने गांव में नारा सुना कपड़ा पहनो खादी के, जय बोलो महात्मा गांधी के। इससे मेरे मन में गांधी के प्रति श्रद्धा का भाव उदय हुआ। तभी से दिल में स्वतंत्रता की चिंगारी सुलग उठी थी। पढ़ाई पूरी की। 1924 में प्राथमिक शाला सोरर और फिर 1928 में अर्जुंदा मिडिल स्कूल में शिक्षक बना। इसके बाद स्वतंत्रता की चिंगारी धधकने लगी। सप्ताह में चार दिन छुट्टी के बाद बच्चों और शिक्षकों को साथ लेकर जनजागरण करने कांदुल, परसतरई, मनकी, मटिया आदि गांव जाते थे। जुलूस में तिरंगा लेकर चलते थे और अंगे्रजी सत्ता के खिलाफ में नारे लगाते थे। गांव वाले चौपाल में जमा हो जाते और हम लोग भाषण देते थे। मुझे पहले भाषण देने में कंपकंपी होती थी। बाद में निर्भयता आती गई। उनके कदम का कुछ लोग उपहास भी उड़ाते थे, लेकिन वे अपने लक्ष्य से नहीं डिगे।

शिक्षक से सेनानी और विधायक तक का सफर
1961 में उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक के पुरस्कार से नवाजा। पुरस्कर लेकर लौटने पर ग्राम लाटाबोड़ में स्वागत हुआ। यह जीवन का अविस्मरणीय क्षण रहा। 60 साल की उम्र में कांग्रेस ने उन्हें बालोद विधानसभा क्षेत्र से टिकट दिया। विधायक चुन लिया गया। 1967, 1972 और 1980 में तीन बार विधायक रहा।

कई बार गए जेल
जिस समय मैं पैरी (सिकोसा) के स्कूल में था, तब मेरा काम अंग्रेजों के खिलाफ पर्चा बांटना था। साथ में डाक खाने का भी काम देखता था। अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे को डाक के डिब्बे में छिपाकर रखते थे। पर्चा भड़काने वाला होता था। जिसमें रेलपांत उखाडऩे, डाकघर जलाने, टेलीफोन के खंभे उखाडऩे का आह्वान होता था। मेरे पर्चा बांटने की भनक अंग्रेजों को लग गई। जांच के लिए सीआईडी हवलदार को पैरी भेजा। वह पूरे दिन मेरे साथ रहा। लेकिन मैंने भी पर्चा बनियान में लपेटकर पैरी के किसान रामप्रसाद को दे दिया और उन्होंने पैरावट में छिपा दिया।

सीआईडी को पर्चा नहीं मिला, लेकिन उन्हें यकीन हो गया था कि मैं अंग्रेजों की खिलाफत करने पर्चा बांटता हंू। बाद में लाटाबोड़ के पटवारी मोहम्मद हुसैन आए। उन्होंने राज खोलते हुए बताया कि सीआईडी और मुझे दोनों को आदेश है कि कैसे भी आपसे पर्चा हासिल करें। इसके बाद अर्जुंदा के थानेदार किदवई आए। उन्होंने कहा कि केवल एक पर्चा दे दें, आपके ऊपर कोई कार्रवाई नहीं होगी। मैंने भी कह दिया कि पर्चा तो बंट चुुका है। आप लोगों से प्राप्त कर लें। मेरी इस स्वीकारोक्ति के बाद मैं अंग्रेजों की नजर में चढ़ चुका था। नतीजा कई बार बर्खास्तगी और जेल यात्रा रही।

स्वतंत्रता की वो पहली सुबह
15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति की घोषणा हुई। तब मैं डौंडीलोहरा में पदस्थ था। मन्नाराम पंाडेय उस समय दीवान थे, चंद्रिका प्रसाद पांडेय और पंडित राधेश्याम शर्मा की उपस्थिति में गांव वालों की बैठक हुई। आजादी का जश्न जोरदार ढंग से मनाने का निर्णय लिया गया। गांव में तत्काल विजय चबूतरा बनवाया। सुबह बच्चों का जुलूस निकाला। हर तरफ उल्लास और उमंग था। जमीदारों ने बच्चों को पेंट-शर्ट दिया। गरीबों को भोजन खिलाया और वस्त्र बांटे।