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Republic Day 2026: नारागांव के जंगलों में रची गई थी आजादी की रणनीति, 4 स्वतंत्रता सेनानियों का बना स्मारक, जानें इसका इतिहास

Republic Day 2026: बालोद जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के गांव नारागांव का इतिहास अलग है। यहां के घने जंगल में आजादी के दीवानों की बैठक होती थी और योजना बनाते थे।

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नारागांव के जंगल में जुटते थे स्वतंत्रता सेनानी (फोटो सोर्स- पत्रिका)

नारागांव के जंगल में जुटते थे स्वतंत्रता सेनानी (फोटो सोर्स- पत्रिका)

Republic Day 2026: बालोद जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के गांव नारागांव का इतिहास अलग है। यहां के घने जंगल में आजादी के दीवानों की बैठक होती थी और योजना बनाते थे। इसके बाद अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगता था। यहां स्वतंत्रता संग्राम के चार सेनानियों पीतांबर मंडावी, सुकालूराम करियाम, सरजूराम मंडावी, बिसाहू राम गावड़े का समाधि स्थल है। यह एकता की मिसाल है। गुलामी के दौरान इन सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन किया था। आज गणतंत्र दिवस पर स्मारक स्थल पर पहुंचकर ग्रामीण चारों सेनानियों को याद कर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे।

पं. सुंदर लाल शर्मा के नेतृत्व में चारों ने लड़ी थी लड़ाई

नारागांव के चारों सेनानी पीतांबर मंडावी, सुकालूराम करियाम, सरजूराम मंडावी, बिसाहू राम गावड़े ने ग्रामीणों के साथ पंडित सुंदरलाल शर्मा से रायपुर में मुलाकात की। कई दिन तक पंडित शर्मा के साथ रायपुर में रहकर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते रहे। वर्ष 1930 में रूद्री जंगल सत्याग्रह की घोषणा की गई। इस साल पंडित शर्मा को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजों ने 18 अक्टूबर 1930 को नारागांव के इन चारों सेनानियों को दुर्ग से गिरफ्तार कर मुकदमा चलाया। चारों को एक-एक माह के सजा दी गई। बालोद के केंद्रीय कार्यालय के प्रमुख दाऊ नरसिंह अग्रवाल की गिरफ्तारी के बाद यहां के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की धरपकड़ अंग्रेजों ने शुरू कर दी थी।

सेनानियों की याद में मैराथन व कबड्डी का आयोजन

गणतंत्र दिवस के बाद इस गांव में सेनानियों की याद में मैराथन दौड़ व कबड्डी का आयोजन किया जाएगा। ग्राम पंचायत नारागांव के उपसरपंच जगन्नाथ साहू ने बताया कि हमें गर्व है कि हम सेनानियों के इस गांव में रहते हैं। गणतंत्र दिवस पर हम गांव के इस स्मृति स्थल पर हम इन सेनानियों को श्रद्धांजलि देंगे।

ग्रामीणों ने किया संघर्ष तब बना स्मारक

सेनानियों के स्मारक व समाधि स्थल बनाने के लिए परिजनों व ग्रामीणों ने अपने स्तर पर संघर्ष किया। शासन, जिला प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधियों को आवेदन सौंपा। आजादी के 75 साल बाद 2022-23 में स्मारक व समाधि स्थल बनाने जिम्मदारों ने सुध ली। आजादी के बाद भी परिजन बरसों तक स्मारक स्थल बनाने के लिए विभागीय अफसरों के चक्कर लगाने मजबूर होते रहे। स्मारक बनने के बाद ग्रामीणों ने भी प्रशासन का आभार माना