6 अप्रैल 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

मिट्टी के दीयों में छिपी इस कुम्हार परिवार की खुशियां, इस दिवाली परंपरागत दीपक जलाकर करें जिंदगी रोशन

दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों की चाक अब तेजी से चलने लगी है। पूरा परिवार मिट्टी के दीपक बनाने में लगा है। उन्हें इस बार अच्छी बिक्री की उम्मीद है।

2 min read
Google source verification

बालोद

image

Dakshi Sahu

Oct 16, 2019

मिट्टी के दीयों में छिपी इस कुम्हार परिवार की खुशियां, इस दिवाली परंपरागत दीपक जलाकर करें जिंदगी रोशन

मिट्टी के दीयों में छिपी इस कुम्हार परिवार की खुशियां, इस दिवाली परंपरागत दीपक जलाकर करें जिंदगी रोशन

बालोद. दीपावली पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने मिट्टी के दीपक बनाने वाले कुम्हारों की चाक अब तेजी से चलने लगी है। पूरा परिवार मिट्टी के दीपक बनाने में लगा है। उन्हें इस बार अच्छी बिक्री की उम्मीद है। जिले के ग्राम नेवारीकला, सांकरी में स्थित कुम्हारों की बस्ती में उनका परिवार मिट्टी का सामान तैयार करने में व्यस्त हैं। ग्राम नेवारी निवासी घनश्याम, ब्रिज लाल आदि कुम्हारों ने बताया कि मिट्टी के दीपक बनाने में मेहनत लगती है। रोजाना 100 से 200 दीपक बना रहे हैं।

पूरा परिवार बनाता है मिट्टी के दीपक व बर्तन
जिले के ग्राम नेवारीकला व ग्राम सांकरी में कई कुम्हार परिवार मिट्टी के बर्तन, दीपक बनाते हैं। वर्तमान में इन कुम्हारों के घरों में मिट्टी के दीपक, मटकी आदि बनाने माता-पिता के साथ उनके बच्चे भी हाथ बंटा रहे हैं। कोई मिट्टी गूंथने में लगा है तो किसी के हाथ चाक पर बर्तनों को आकार दे रहे हैं।

दीपावली पर्व पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। मिट्टी से निर्मित चार, छह, बारह एवं चौबीस दीपों वाली मिट्टी की ग्वालिन की पूजा की जाती है। मिट्टी की छोटी मटकियों में धान की खीलें भरकर उनकी पूजा होती है।

दीपावली व गर्मी में बढ़ती है मांग
कुम्हार राजेश, शिवचरण का कहना है कि दीपावली व गर्मी के सीजन में मिट्टी से निर्मित बर्तनों की मांग जरूर बढ़ जाती है, लेकिन बाद के दिनों में वे मजदूरी करके ही परिवार का पेट पालते हैं। दूर से मिट्टी लाना, महंगी लकड़ी खरीदकर दीपक पकाने में जो खर्च आता है, उसके बदले आमदनी लगातार घटती जा रही है।

घर के आठ सदस्य दिन रात मेहनत करके एक दिन में एक सैकड़ा दीपक बना पाते हैं, वहीं दूसरी ओर बाजारों में इलेक्ट्रानिक्स झालरों की चमकदमक के बीच मिट्टी के दीपक की रोशनी धीमी पड़ती जा रही है, जिसके चलते लोग दीपकों का उपयोग महज पूजन के लिए ही करने लगे हैं।