
ये पुलिस फोर्स नहीं बस्तर के महान कंगला मांझी सरकार के हैं वीर सैनिक, जानिए कैसे स्वतंत्रता आंदोलन में अंग्रेजों से लिया था लोहा
बालोद. आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन के संरक्षण व अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने आजाद हिंद फौज के संस्थापक सुभाषचंद्र बोस और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में गठित मांझी सरकार (Kangla manjhi sarkar) के सैनिक आज भी जिंदा हैं। नेतृत्वकर्ता कंगला मांझी (हीरासिंह देव) की 37वीं शहादत दिवस पर 5 दिसंबर को उनके समाधि स्थल डौंडीलोहारा विकासखंड के बघमार में मांझी सरकार के सैनिक सलामी देंगे। कार्यक्रम में राज्यपाल अनुसूईया उइके भी शामिल होंगी और कंगला मांझी को श्रद्धांजलि देंगी।
आजाद हिंद फौज की तरह तैयार किया नया फौज
मांझी के पुत्र केडी कांगे ने बताया कि 1914 में अंग्रेजों ने बस्तर के आदिवासियों को दबाने की कोशिश की थी। सैकड़ों हत्याएं हुर्इं। इसी दौरान जेल में मांझी की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई थी। 1920 में कोलकाता में महात्मा गांधी से मिले। इसके बाद मांझी को राष्ट्रीय नेताओं का सहयोग मिलना शुरू हो गया। उन्होंने सुभाषचंद्र बोस के आजाद हिंद फौज की तरह वर्दीधारी सैनिकों की फौज तैयार की।
देशभर में फैले हैं मांझी सरकार के सैनिक
वर्तमान में मांझी के वर्दीधारी सैनिक देशभर मेंं फैले हैं, जो अपनी तरह से देश की सेवा में लगे रहते हैं। मांझी के निधन के बाद उनके सैनिक आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैंं। अभी अखिल भारतीय माता दंतेवाड़ी समाज समिति संगठन संचालित हो रहा है। कंगला मांझी ने 1951 में लाल झंडा फहराया था। 1956 में मांझी को दुर्ग जिले के कचहरी में ध्वज फहराने का गौरव प्राप्त हुआ था।
लोग नहीं जानते मांझी सरकार के बारे में
बालोद जिले के लोगों को अभी भी मांझी सरकार के बारे में जानकारी नहीं है। लोगों को महान क्रांतिकारी के बारे में जानकारी देने जिला मुख्यालय में तीन साल पहले सरदार पटेल मैदान में बड़ी सभा हुई थी। लोग मांझी सरकार को जाने आज भी आदिवासियों को भी मांझी सरकार की त्याग तपस्या के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जबकि जिले में ही उनकी समाधि है।
स्वतंत्रता आंदालेन में हुए शामिल
मांझी सैनिक के बारे में मध्यप्रदेश के राजीव चक्रधारी ने जानकारी दी कि स्वतंत्रता आंदोलन के समय अंग्रेजों के दमन को कुचलने आदिवासी समाज के क्रांतिकारी सदस्य मांझी का जन्म बस्तर के तेलावट में हुआ था। अंग्रेजों के अन्याय के खिलाफ 1913 से वे स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़ गए। डौंडीलोहारा विकासखंड के बघमार गांव से उन्होंने अपना अभियान शुरू किया। बघमार को अपना मुख्यालय बनाया। वे दो साल तक एकांतवास में रहे। उनके राष्ट्रहित आंदोलन से लोगों में एक नया जोश आया। उसके बाद से देशभर में मांझी के सैनिक तैयार होने लगे।
श्रद्धांजलि समारोह में मास्क अनिवार्य
5 दिसंबर को कंगला मांझी के शहादत पर समाधि स्थल बघमार में सैकड़ों सैनिक उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। बिना मास्क के किसी भी व्यक्ति को प्रवेश नहीं दिया जाएगा। यह सैनिक प्रदेश सहित महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, ओडिशा, झाररखंड से पहुंच रहे हैं। शनिवार को जिला मुख्यालय सहित कुसुमकसा में भी कई वर्दीधारी सैनिक दिखे। उन्हें देख लोग हैरत में पड़ गए। बाद में पता चला ये और कोई नहीं बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले, शोषण व अन्याय के खिलाफ लडऩे वाले स्वतंत्रता सेनानी कंगला मांझी सरकार के सैनिक हैं।
Published on:
05 Dec 2021 11:16 am
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