बलरामपुर. नेपाल की पहाड़ियों से उतरकर राप्ती नदी जब मैदानी इलाकों में कटान करती है तो गांव के गांव नदी में समाहित हो जाते है। गरीबों की जमीनें, फसलें और तिनका-तिनका जोड़कर बनाये गये गये आशियाने पल भर में नदी के आगोश में समा जाते है। राप्ती नदी के कटान पीड़ितों का दर्द उनकी बेबसी में साफ झलकता है।
नेपाल की पहाड़ियों से उतरकर सर्पाकार आकार में राप्ती नदी जिधर मुड जाती है फिर उधर सिर्फ और सिर्फ तबाही का मंजर नजर आता है। गांव के गांव राप्ती की आगोश में समा जाते है। जमीनों और फसलों का भारी नुकसान होता है और खून-पसीने की कमाई से बने आशियाने पल भर में नदी में समाहित हो जाते है। सदर विकास खण्ड के गाँव है कल्याणपुर,टेंगनहिया मानकोट और ढोढरी। राप्ती नदी इन गाँवों में जबरदस्त कटान कर रही है। कल्याणपुर और टेंगनहियां मानकोट गाँव को राप्ती नदी पाँच बार उजाड चुकी है। ग्रामीणों की जमीने और उनके आशियाने अब नदी की मुख्यधारा में समा चुके है। कटान का दर्द पीड़ितों की जुबान से समझा जा सकता है।
कल्याणपुर गाँव के बीचोंबीच एक स्कूल भी था जो राप्ती की मुख्धारा में समा चुका है। टेंगनहिया मानकोट की मस्जिद भी राप्ती नदी में समाहित हो गयी। तटवर्ती गाँवों के बाशिंदे तटबन्ध पर झोपड़ियों में रहने को मजबूर है। शासन और प्रशासन प्रतिवरिष बाढ़ पीडितों और कटान पीड़ितों को लेकर बडे-बडे वादे जरुर करते है लेकिन धरातल पर उनका अमल नहीं हो पाता। इस समय राप्ती नदी जिले में दो दर्जन स्थलों पर कटान कर रही है। बाढखण्ड फ्लड फाइटिंग के दावे कर रहा है लेकिन राप्ती नदी की कटान को रोक पाने में असमर्थ साबित हो रहा है। जिले में लगभग सौ गाँव ऐसे है जो नदी की कटान से बुरी तरह प्रभावित है और हर साल ग्रामीणों को विस्थापित होना पड़ता है। दो दर्जन गाँव तो ऐसे है जो तटबन्धों पर झोपड़ियां बनाकर अपने जीवन का गुजर बसर कर रहे है। भूमिहीन हो चुके ऐसे कटान पीड़ितों का दर्द सिर्फ वही समझ सकते है जिसने ऐसे दर्द को झेला है।