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सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग के दुर्लभ वनस्पतियां और वन्यजीवो के अस्तित्व पर खतरा

वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित होने के बावजूद इस जंगल की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं है।  

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Danger on Extinction animal

बलरामपुर. प्रकृति की अनमोल धरोहर और विश्व प्रसिद्ध सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग पर लगातार खतरा बढ़ता जा रहा है। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित इस जंगल का लगातार दोहन किया जा रहा है। वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित होने के बावजूद इस जंगल की सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं है। जिसके परिणामस्वरुप यहाँ की दुर्लभ वनस्पतियां और वन्यजीवो के अस्तित्व पर खतरा बढता ही जा रहा है।
सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग का यह है जनकपुर रेन्ज। जंगल के दोहन का यह दृश्य किसी को भी सोचने पर विवश कर सकता है। जहाँ जंगल में घुसना ही कानूनन अपराध है, वहाँ धड़ल्ले से जंगल के पेड़ो को काटकर लकडिय़ां बाहर लाई जा रही हैं। दिनभर जंगल के अन्दर घुसकर लोग लकडिय़ा काटते हैं और शाम ढलने पर ही बाहर निकलते हैं। यह सब कुछ होता है वन विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से। हालांकि जंगल की सुरक्षा में लगे अधिकारी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होने का दावा करते हैं, लेकिन कैमरे में कैद ये नजारे किसी भी दावे को झुठलाने के लिए काफी हैं।
संरक्षणवादी काफी आहत हैं
वन्यजीवों और वनस्पितियों की अनमोल प्राकृतिक धरोहर को अपने आँचल में समेटे सोहेलवा वन्यजीव प्रभाग विश्व के सर्वाधिक खूबसूरत जंगलों में से एक माना जाता है। भारत-नेपाल की खुली सीमा होने के कारण यह जंगल काफी संवेदनशील माना जाता है। 452 वर्ग किलोमीटर में फैले इस जंगल की अकूत प्राकृतिक सम्पदा को देखते हुये इसे 1997 में सेन्चुरी क्षेत्र घोषित कर दिया गया। इस जंगल के लगातार हो रहे दोहन से संरक्षणवादी काफी आहत हैं।
कभी यहाँ दो दर्जन बाघ और पाँच दर्जन तेन्दुएं पाए जाते थे
इस जंगल में आये दिन वन्यजीवों का शिकार करने की बातें सामने आती हंै। जंगल के किसी भी क्षेत्र में चले आये अवैध कटान के निशान आपको हर जगह दिखाई पड़ जायेंगे। खुलेआम लकड़कट्टे भी जंगल के अन्दर विचरण करते हुये नजर आ जायेंगे। दो दशक पूर्व सरकारी आँकड़ो के मुताबिक यहाँ दो दर्जन बाघ और पाँच दर्जन तेन्दुएं पाये जाते थे, लेकिन आज बाघों की संख्या लगभग नगण्य हो चुकी है। यदि जंगल का दोहन इसी तरह होता रहा तो प्रकृति की यह अनमोल धरोहर शीघ्र ही लुप्त हो जायेगा।