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Independence Day Special: भूरागढ़ किला में अंग्रेजों ने दिखाई थी बर्बरता, लटका दिए थे 3300 क्रांतिकारी

-1857 क्रांति में अंग्रेजो की बर्बरता की गवाही देता है भूरागढ़ किला-इलाहाबाद, बिहार और कानपुर के क्रांतिकारी पहुंचे थे भूरागढ़

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पत्रिका न्यूज नेटवर्क
बांदा. Independence Day Memories: देश की आजादी की बात हो तो बुंदेलो की वीरता की गाथा जेहन में उमड़ आती है। स्वतन्त्रता की जंग (Freedom Fight 1857) में देश के कई वीर सपूतों (Martyr Revolutionaries) ने जानें गँवा दी, तब जाकर आज हम आजादी की खुली सांस लेते हैं। ऐसे कई स्थल हैं आज भी मौजूद हैं, जो उन बलिदानियों के मूक गवाह बने स्थित हैं। ऐसा ही बांदा जिले का भूरागढ़ किला (Bhuragarh Fort) है, जो आज भी क्रांतिकारियों की शौर्यता की गवाही देता है। इस भूरागढ़ किला को भूरागढ़ दुर्ग कहा जाता है, यहां अंग्रेजों ने 3300 क्रांतिकारियों को फांसी लटका दिया था। गजेटियर के अनुसार 14 जून 1857 की बात है। आजादी की चिंगारी भड़क उठी थी। अंग्रेजों के खिलाफ बुंदेली ने विगुल फूंक दिया। जंग शुरू होने पर बुंदेलखंड मे बांदा के नवाब अली बहादुर द्वितीय ने नेतृत्व किया था। मगर उस क्रांति में रणछोड़ सिंह दउवा ने अंग्रेजों का साथ देकर गद्दारी की थी।

कई जिलों के क्रांतिकारी इस क्रांति में कूदे

इस विद्रोह की ज्वाला इतनी भड़क गई कि था इलाहाबाद, कानपुर और बिहार के क्रांतिकारी भी आकर कूद पड़े। अगले ही दिन 15 जून 1857 को क्रांतिकारियों ने ज्वाइंट मजिस्ट्रेट मि. काकरेल की हत्या कर दी थी। इसके बाद 16 अप्रैल 1858 में हिटलक का आगमन हुआ। बांदा की विद्रोही सेना ने उससे भी युद्ध किया था। इस जंग में तीन हजार क्रांतिकारी भूरागढ़ दुर्ग में मारे गए थे, जबकि बांदा गजेटियर में केवल आठ सौ लोगों के शहीद होने का जिक्र है। 18 जून 1859 में 28 व्यक्तियों के नाम विशेष तौर पर मिलते हैं, जिन्हें अंग्रेजों की अदालत में मृत्युदंड व काला पानी की सजा सुनाई गई थी। भूरागढ़ दुर्ग के आसपास अनेक शहीदों की कब्र हैं।

किले में अंग्रेजों ने दी थी 33 सौ लोगों को फांसी

इतिहासकार शोभाराम कश्यप बताते हैं कि बुंदेलखंड में भूरागढ़ किला 1857 की क्रांति का गढ़ था। 1857 की क्रांति में जब जनरल ह्यूरोज ने झांसी को घेर लिया था। इस पर रानी लक्ष्मीबाई ने बानपुर के राजा मर्दन सिंह के हाथ बांदा के नवाब अली बहादुर को राखी और चिट्ठी भेजकर मदद मांगी थी। तब उन्होंने मुनादी कराकर कहा कि झांसी जाने वाले भूरागढ़ में एकत्र हो जाएं। तब तीन दिनों में क्रांतिकारी तैयारी के साथ पहुंचे थे। नवाब झांसी तो पहुंच गए, लेकिन रतन सिंह ने अंग्रेजों की मदद से भूरागढ़ में कब्जा कर लिया था। इस युद्ध में भूरागढ़ किले में 33 सौ लोगों को अंग्रेजों ने फांसी दी थी। आज भी इस क्रांति की गवाही भूरागढ़ दुर्ग देता है।