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देश में दूरदर्शी प्रयोग के 400 साल पूरे

वर्ष 1618 में पहली बार गोवा में हुआ था दूरदर्शी का प्रयोग

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देश में दूरदर्शी प्रयोग के 400 साल पूरे

गोवा में ही आयोजित किया जा रहा मुख्य समारोह
बेंगलूरु. भारत में दूरदर्शी के प्रयोग के 400 साल पूरे हो गए हैं। दूरदर्शी के आविष्कार के एक दशक के भीतर यह उपकरण भारत में आया और इससे ब्रह्मांड का अध्ययन शुरू हुआ।
यहां स्थित भारतीय ताराभौतिकी संस्थान के प्रोफेसर (सेनि) रमेश कपूर ने बताया कि नीदरलैंड्स के हांस लिपर्सेे ने दूरदर्शी के मूल रूप को वर्ष 1608 में पेश किया। शीघ्र ही 1609 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक गैलीलियो के हाथों विज्ञान के एक शक्तिशाली उपकरण के रूप में यह यंत्र प्रतिष्ठित हो गया। इसके जरिए आकाश के अवलोकन से सभ्यता के इतिहास में मनुष्य को पहली बार कोपरनिक्स द्वारा प्रस्तावित सौरमंडल और विश्व के रूप को महत्वपूर्ण समर्थन मिला जिसके अनुसार पृथ्वी नहीं सूर्य संपूर्ण ग्रह मंडल के केंद्र में था। भारत में दूरदर्शी का प्रयोग इसके आविष्कार के एक दशक के भीतर ही हो गया।
उन्होंने बताया कि आधुनिक खगोल के इतिहास में वर्ष 1618 एक तरह से अनूठा कहा जा सकता है। इस वर्ष तीन महाधूमकेतुओं का उदय हुआ।
पहला अगस्त और शेष दो नवम्बर के महीने में। एक के बाद एक तीन विशाल और चमकीले पुच्छल तारों के आगमन ने यूरोप में जैसे सनसनी फैला दी। इसके सामाजिक प्रभाव हुए जो मुख्यत: इनसे जुड़े अंधविश्वास को लेकर थे। धूमकेतुओं की प्रकृति को लेकर विचारकों और वैज्ञानिकों के बीच भी विवाद छिड़ गए। यूरोप से बहुत दूर इन धूमकेतुओं में से दो जो नवम्बर में उदित हुए भारत में भी देखे गए। यह एक अद्भूत मौका था जब दो विधाओं के खगोल वैज्ञानिकों ने इनका नजारा ही नहीं किया बल्कि इनके मापन भी लिए। इन दोनों धूमकेतुओं का जिक्र बादशाह जहांगीर के संस्मरणों में भी मिलता है जो काफी रोचक है। इनमें बताई गई तारीखों और इन धूमकेतुओं की अन्य स्थानों से हुई खोज के आधार पर बादशाह जहांगीर भी इनके स्वतंत्र खोजकर्ता साबित होते हैं।
इन धूमकेतुओं के वैज्ञानिक अध्ययन गोवा से भी हुए। यह समूह था जेसुइट मिशनरियों का जो पुतर्गाल से अपने धर्म के प्रचार करने के उद्देश्य से चला आया था और अक्टूबर 16 18 से गोवा में ठहरा हुआ था। यह मिशनरी अपने साथ कुछ दूरदर्शी यंत्र और कई पुस्तकें भी लाए थे। इन धूमकेतुओं के अवलोकनों का वर्णन एक पुस्तक में दिया गया जो लगभग 400 साल तक लुप्तप्राय थी। इस पुस्तक में धूमकेतुओं के लिए दूरदर्शी के उपयोग का जिक्र है। इस विषय में प्रो. कपूर ने विस्तार से खोजबीन की एवं इसे 2016 में एक शोध पत्र के रूप में प्रकाशित किया। वर्ष 2018 में भारत में दूरदर्शी के इस प्रथम प्रयोग के 400 वर्ष पूरे होते हैं।
एस्ट्रोनॅामिकल सोसायटी ऑफ इंडिया की जनसंपर्क समिति आगामी 11-18 नवम्बर के बीच अनेक आयोजन कर रही है। इस संबंध में दूरबीन से आकाश दर्शन और व्याख्यानों का आयोजन भी किया जा रहा है।
इस कार्यक्रम में गोवा साइंस सेंटर एसोसिएशन ऑफ फ्रेंड्स ऑफ एस्ट्रोनॉमी आदि संगठन भी शामिल हैं। 11 नवम्बर को इसी विषय में गोवा साइंस सेंटर में डॉ कपूर का व्याख्यान होगा। इन सभी कार्यक्रमों में छात्र और सामान्य जन सभी भाग ले सकते हैं।