2 फ़रवरी 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

पिछले 8 साल में सामरिक और रणनीतिक महत्व के 6 उपग्रह गंवाएं

आर्थिक ही नहीं, कई मोर्चों पर देश ने उठाया नुकसान

3 min read
Google source verification

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) के सामरिक और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ईओएस एन-1 उपग्रह के प्रक्षेपण में मिली विफलता से देश की सुरक्षा तैयारियों को गंभीर झटका लगा है। पिछले लगभग 8 वर्षों के दौरान दुर्भाग्य से भारत के ६ महत्वपूर्ण मिशन विफल हुए हैं। इससे प्रत्यक्ष तौर पर देश को लगभग ढाई हजार करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है, लेकिन क्षति का आकलन महज आर्थिक आधार पर एकतरफा नहीं किया जा सकता।

वर्ष 2017 से लेकर 12 जनवरी 2026 तक इसरो ने पीएसएलवी, जीएसएलवी, एलवीएम-3 और एसएसएलवी के कुल 45 मिशन लांच किए हैं। इन 45 में से 6 मिशनों में रॉकेट या उपग्रहों में आई विसंगति के कारण इसरो को गहरा झटका लगा। मिशनों की विफलता से अहम मौकों पर देश अंतरिक्ष आधारित क्षमताओं की तैनाती से देश चूक गया। कई अहम मौकों पर दूसरी अंतरिक्ष एजेंसियों से सेवाएं खरीदनी पड़ी, जिससे दोहरी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। विफल मिशनों के लिए स्थानापन्न उपग्रह लांच करने पड़े, जिससे आर्थिक बोझ और बढ़ा। इतना ही नहीं, विफलताओं के चलते कतारबद्ध लांच मिशन भी प्रभावित हुए और अंतरिक्ष संसाधनों को हासिल करने की समय-सीमा प्रभावित होती रही है।

पीएसएलवी सी-62 के विफलता से फिर एक बार भविष्य के कई मिशनों पर असर पडऩे की संभावना है। विशेष तौर पर भारतीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (नाविक शृंखला) निष्क्रिय होने के कागार पर है। इस शृंखला के अधिकांश उपग्रह निष्क्रीय हो चुके हैं और नौवहन सेवाओं के लिए देश फिर एक बार अमरीकी नौवहन प्रणाली जीपीएस पर निर्भर हो गया है। नाविक प्रणाली को सक्रिय किए जाने के लिए एनवीएस शृंखला के कई उपग्रहों का प्रक्षेपण इस साल प्रस्तावित है। इनमें से कई उपग्रह पीएसएलवी से लांच किए जाने वाले थे, लेकिन अब उनमें विलंब होना स्वाभाविक है। जब तक पीएसएलवी की विफलता की जांच करने वाली समिति रिपोर्ट नहीं देती और उसके अनुरूप रॉकेट में सुधार नहीं होता, इस रॉकेट का उपयोग नहीं होगा। इसरो सूत्रों के मुताबिक अब पीएसएलवी के फिर से उड़ान भरने में फिर एक बार छह महीने तक का समय लग सकता है।

आत्म विश्वास पर असर

इसी साल निजी क्षेत्र का पहला पीएसएलवी भी कुछ सप्ताह में लांच करने की योजना थी। बड़े पैमाने पर उपग्रह प्रक्षेपण की जरूरतों को देखते हुए, पीएसएलवी निजी हाथों में देने की तैयारी है। पिछले कई वर्षों से बनी इस योजना पर अभी तक अमल नहीं हो पाया है। फिर एक बार इसमें विलंब होना स्वाभाविक है। वहीं, मिशन की विफलता से इसरो के आत्म विश्वास पर असर पड़ेगा, जिससे इस साल के गगनयान समेत तमाम मिशनों पर भी असर पड़ सकता है।

पिछले 8 वर्षों में मिली विफलता

इसरो की इन विफलताओं के कारण देशको कई नौवहन और भू-प्रक्षेपण उपग्रह गंवाने पड़े हैं। पिछले 31 अगस्त 2017 को पीएसएलवी सी-39 की विफलता से नौवगहन उपग्रह आइआरएनएसएस-1 एच उष्मा कवच (हीट शील्ड) में फंसा रहा और कक्षा में स्थापित नहीं हो सका। पिछले साल 29 जनवरी 2025 को जीएसएलवी एफ/15 से नाविक शृंखला का एक अन्य उपग्रह एवीएस-02 पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया गया, लेकिन उपग्रह के एक वाल्व में आई खराबी के कारण उसे ऑपरेशनल कक्षा तक नहीं पहुंचाया जा सका। देश उसकी सेवाओं से वंचित रह गया। पिछले ही साल 18 मई को पीएसएलवी सी-61 की नाकामी के कारण राडार इमेजिंग उपग्रह ईओएस -09 कक्षा में स्थापित नहीं हो सका। इसी शृंखला का एक अन्य उपग्रह ईओएस-03 का प्रक्षेपण 12 अगस्त 2021 को जीएसएलवी एफ-10 से किया गया था, जो विफल रहा। ईओएस-03 किसी बड़े भू-भाग की रीयल टाइम में निगरानी करने में सक्षम था। मार्च 2018 में जीसैट-6 ए को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने के बावजूद देश को उसकी सेवाएं नहीं मिली। घनाभ आकार के जीसैट-6 ए में सी और एस बैंड ट्रांसपोंडर थे। ये ट्रांसपोंडर सामरिक जरूरतों के लिए थे, लेकिन उपग्रह से संपर्क टूट गया और मिशन डेड हो गया।

Story Loader