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स्वार्थमय जीवन समाज को पतन के गर्त में ले जाता है-आचार्य देवेन्द्रसागर

धर्मसभा का आयोजन

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स्वार्थमय जीवन समाज को पतन के गर्त में ले जाता है-आचार्य देवेन्द्रसागर

स्वार्थमय जीवन समाज को पतन के गर्त में ले जाता है-आचार्य देवेन्द्रसागर

बेंगलूरु. राजाजीनगर के सलोत जैन आराधना में आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि मनुष्य और समाज, शरीर और उसके अंगों के सदृश हैं। दोनों परस्पर पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का स्थायित्व संभव नहीं है। दोनों में आपसी सहयोग परमावश्यक है। मनुष्य की समाज के प्रति एक नैतिक जिम्मेदारी होती है, जिसके बिना समाज सुव्यवस्थित नहीं रह सकता। इसे हम मानव शरीर के उदाहरण द्वारा उचित तरीके से समझ सकते हैं। शरीर के विभिन्न अंग यदि अपना काम करना छोड़ दें, तो वह शिथिल और जर्जर हो जाएगा। शरीर को सुदृढ़ व स्वस्थ बनाने के लिए प्रत्येक अंग का कार्यरत व क्रियाशील होना बहुत जरूरी है, ठीक यही स्थिति समाज के लिए आवश्यक है। समाज को समुचित स्थिति में रखने के लिए प्रत्येक मनुष्य में अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिए क्रियाशीलता अपेक्षित होती है। विभिन्न अंगों के पृथक ढंग से कार्य करने पर असहयोग की स्थिति उत्पन्न होगी। उस समय शरीर की दशा अत्यन्त शोचनीय हो जाएगी। शरीर एक मशीन की भांति है, एक भी पुर्जा गड़बड़ हुआ, तो सारी मशीन बिगड़ जाती है। व्यक्ति का स्वार्थमय जीवन भी समाज के लिए अत्यंत दुखदायी है। इस स्थिति में समाज का सदस्य सुखी नहीं रह सकता। इस प्रसंग पर कामधेनु गोशाला ट्रस्ट के पदाधिकारी भी उपस्थित थे।