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आचार्य ने की कर्म और भाग्य की व्याख्या

धर्मसभा का आयोजन

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आचार्य ने की कर्म और भाग्य की व्याख्या

आचार्य ने की कर्म और भाग्य की व्याख्या

बेंगलूरु. बिड़दी में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि इंसानी दिमाग में सवाल घूमता रहता है कि जीवन में जो घटित होता है वह हमारे कर्मों का नतीजा है या फिर भाग्य की देन। सभी अपनी-अपनी समझ के अनुसार इसका उत्तर भी ढूंढते रहते हैं। कुछ मानते हैं कि जीवन में सब कुछ कर्म की बदौलत घटित होता है, उनकी सोच जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान, पर आधारित है। दूसरी ओर, भाग्यवादी लोग कहते हैं कि जीवन में सब कुछ पूर्वनिर्धारित है। तीसरी श्रेणी मध्यमार्गियों की है, जो कहते हैं कि जीवन में कर्म और भाग्य साथ-साथ चलते हैं और अकेले कर्म से भी काम नहीं चलता है और भाग्य भी अकेले कुछ नहीं कर सकता। बड़ी तादाद इसी मार्ग के पथिकों की है।

उन्होंने कहा कि सामान्यत: उम्र के शुरुआती दौर में लोग कर्म की प्रधानता को महत्व देते हैं और उम्र ढलने के साथ भाग्य की शरण में जाने लगते हैं। यानी युवावस्था में कर्म, वृद्धावस्था में भाग्य। और इन दोनों अवस्थाओं के बीच के दौर में इंसान कभी कर्म तो कभी भाग्य की ओर पेंडुलम की तरह इधर-उधर होता रहता है।