
मानव जीवन की ज्वलंत समस्या है क्रोध-ज्ञानमुनि
बेंगलूरु. विजयनगर में विराजित पंडित रत्न ज्ञानमुनि ने कहा कि आज के मानव जीवन की ज्वलंत समस्या है क्रोध। प्राय: सभी लोगों की शिकायत है कि गुस्सा बहुत आता है। यह समस्या चाहे कोई छोटा हो या बड़ा, जवान हो या बूढ़ा, गृहस्थ हो या सन्यासी प्राय: सभी की है। हालांकि क्रोध करने का ढंग सबका अपना-अपना है। कोई खुलकर क्रोध कर लेता है जिसे हम प्रत्यक्ष रूप से क्रोध करना कह सकते हैं। कुछ लोग अप्रत्यक्ष रूप से क्रोध करते हैं। जैसे खाना छोड़ देना, मुंह फुला लेना, बातचीत बंद कर देना, एक कमरे में बंद हो जाना और अपने कर्तव्यों से पीछे हटना इत्यादि प्रवत्तियों से स्वयं को संकुचित सोशित करते हैं। क्रोध का सीधा सा अर्थ है दौड़ आए आग में दूसरे की तरफ और आक्रोश का मतलब है कि दौड़ आए अपनी तरफ। प्रत्येक मानस पटल पर यह प्रश्न अवश्य उभरता है कि क्रोध कैसे मिटे। ज्ञानी पुरुषों का कथन है कि सबसे पहले यह जानो कि क्रोध कहां से पैदा होता है। इसका उत्तर है कि क्रोध अपने ही भीतर की गलती से होता है। इससे एक बात स्पष्ट हो गई कि दूसरा व्यक्ति क्रोध का जिम्मेदार नहीं है। क्योंकि क्रोध का दूसरे से कोई संबंध नहीं है। दूसरा व्यक्ति हमारे क्रोध का निमित्त है पर कारक नहीं हो सकता।
आश्चर्य है कि आदमी अपनी जलती हुई बारूद को न देखकर जलती हुई चिनगारी को देखता है। क्रोध के असली जिम्मेदार हम स्वयं हैं। अभी तक की हमारी जीवन शैली ऐसी रही है कि हम सदा अपने क्रोध का जिम्मेदार दूसरे को मानते हैं। जब व्यक्ति दुखी है तो वह समझता है कि दूसरा उसे दुखी कर रहा है। आदमी की सबसे बड़ी भूल ये है कि वह इस बात को स्वीकार ही नहीं करता कि क्रोध उसके भीतर से आ सकता है और आ रहा है। ऐसी अवस्था में क्रोध की अग्नि भड़कती चली जाती है। जिस दिन वह समझ में आ जाएगा कि क्रोध के जिम्मेदार हम स्वयं हैं तब क्रोध का मूल कारण समझ में आ जाएगा। कुछ लोग ये तर्क देते हैं कि वैसे में क्रोधी नहीं हूं, किंतु गलत बात मुझसे बर्दाश्त नहीं होती।
Published on:
15 Sept 2020 10:03 am
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