
हुब्बल्ली. राज्य विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। भारी-भरकम प्रचार शुरू होने वाला है। ऑटोरिक्शा, दीवार, पेडों पर बड़े बड़े फ्लेक्स ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। इन सब को देख कर एक तबका संकट में आ गया है। यही वो लोग हैं जो चुनाव बैनर लिखकर अपना पेट भरने वाले कलाकार हैं।
चुनाव के दौरान कई पार्टियों के नेताओं के पक्ष में सुंदर बैनरों को लिखकर देने वाले कलाकार रामनाथ बी कबाड़ी आज गदग-बेटगेरी में मोटर साइकिलों के नम्बर प्लेट पर स्टिकर चिपका रहे हैं। टी.एन. शेषन मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे तो उनके कार्यकाल में चुनावों का स्वरूप ही बदल दिया। हर कहीं बैनरों को लगाने, फिजूल खर्च, विपरीत लाउडस्पीकरों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया। चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार के लिए कपड़े के बैनर अक्षरों को लिखकर देने की भी सीमा तय की थी।
कूली मजदूरी कर रहे कलाकार
अधिकतर कलाकार चंद्रशेखर यड्रावी जैसे खुशकिस्मत नहीं हैं क्योंकि उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं करने वाले कलाकार अधिक मौकों की तलाश में बेंगलूरु जैसे शहरों को नहीं गए। स्थानीय तौर पर फ्लेक्स पेंटिंग मशीनों को लगवाने के लिए लाखों रुपए पूंजी भी नहीं थी। इसके चलते छुटपुट कुली मजदूरी करना अनिवार्य बन गया है। सीबीटी में यूसुफ नामक बैनर लिखने वाले अद्भुत कलाकार हैं। बदलते हालात पर समायोजित नहीं होने से अनिवार्य तौर पर आज शामियाना लगाने की कुली मजदूरी का काम कर रहे हैं।
एम.सी. चेट्टी, प्राचार्य, विजय महांतेश कला महाविद्यालय हुब्बल्ली
बेरोजगार हुए कलाकार
&मांग के अनुसार फ्लेक्स को केवल पल भर में ही छापने वाले डिजीटल उद्योग के विकास के बाद तो बैनर बनवाकर देने वाले कलाकार बेरोजगार हो गए। वे बेंगलूरु में फिलहाल फिल्मों के कटआउट तैयार कर रहे हैं। चंद्रशेखर यड्रवी, कलाकार
काम तलाशना पड़ रहा है
&पिछले चुनाव के दौरान बीएसआर कांग्रेस पार्टी के नेता मौजूदा भाजपा सांसद बी. श्रीरामुलु ने पार्टी के प्रचार के लिए कपड़े के बैनरों को लिखवाया था परन्तु दूसरी पार्टी वोलों ने फ्लेक्स के इस्तमाल पर रुची दिखाने से अधिकतर कलाकारों को बेरोजगार होना पड़ा और छुटपुट काम तलाशना पड़ा।
प्रताप बहुरूपी, कलाकार
फ्लेक्स मशीन खरीदना सम्भव नहीं
&प्रतिदिन बैनर लिखकर जीवन गुजारने वालों के लिए फ्लेक्स मशीन खरीदना सम्भव नहीं है क्योंकि एक मशीन की लागत 12 लाख से 30 लाख रुपए हैं। इतना पूंजी जुटाना आसान काम नहीं है।
चंद्रकांत जट्टेण्णवर, कला शिक्षक
दूसरा काम नहीं आता
&हमें दूसरा काम नहीं आता। पूर्वमें चुनाव के दौरान अधिक कमाते थे। आज हमें पूछने वाला ही नहीं है। और चार पांच वर्ष काम कर सकते हैं परन्तु आगे क्या करें इसी चिंता में हैं।
रामनाथ बी कबाडी, कलाकार
Published on:
11 Jan 2018 10:37 pm
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