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संतुलित मानसिकता, बारहमासी रसीला फल-आचार्य देवेन्द्र सागर

धर्मसभा का आयोजन

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संतुलित मानसिकता, बारहमासी रसीला फल-आचार्य देवेन्द्र सागर

संतुलित मानसिकता, बारहमासी रसीला फल-आचार्य देवेन्द्र सागर

बेंगलूरु. राजस्थान जैन मूर्तिपूजक संघ जयनगर में चातुर्मासिक प्रवचन में आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि ऐसा नहीं है कि हर मनुष्य निराशावादी ही होता है। मगर पल-पल अवसाद के घेरे में रहना किसी-किसी की आदत सी हो जाती है। पीड़ा में जीना उसकी लत बन जाती है। किंतु यह भी सच है कि कुछ लोग अचानक आने वाले आघात को भी सहजता से झेल जाते हैं। यह इसलिए संभव हो पाता है कि ऐसे लोग अपने विचारों का संतुलन बनाना जानते हैं। इसके लिए मजबूत आत्मविश्वास की जरूरत होती है। तन में शुष्कता हो तो हम रसीले फलों का जूस पीकर चैन पा लेते हैं पर संतुलित मानसिकता एक ऐसा बारहमासी रसीला फल है, जो हर क्षण सुकून वाली तरावट पहुंचाता रहता है। ऐसे लोगों में उदासी की गति धीमी होकर रुक जाती है और आशा की तरंगें उसके जीवन की सतह पर दौड़ लगाने लगती हैं। सांसों की लय को सब तरफ से सही माहौल मिले तो दिनचर्या का मधुर अनुभव जीवन को सही दिशा की ओर ले जाता है। अपने आसपास के वातावरण में जरा गौर करके देख लीजिए कि वे लोग कौन हैं जो सदैव प्रफुल्लित रहते हैं, अपने विचारों को कभी मैला होने ही नहीं देते। जिसने दस हजार असफल प्रयोग करने के बाद भी महान वैज्ञानिक एडिसन का हौसला टूटने नहीं दिया। मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो सही सोच-विचार मन की हरियाली का प्रतीक है। कहने का तात्पर्य है कि सुलझी सोच का परिणाम सदैव अच्छा ही होता है। सही सोच से जीवनशैली बदल जाती है और किसी औषधि की भांति यह हमारी मदद करती रहती है। प्रवचन से पूर्व आचार्य श्री को लाभार्थी परिवार द्वारा धर्मबिंदु ग्रंथ अर्पण किया गया जिसके आधार पर प्रतिदिन प्रवचन होगा।