
सेना का बैंकर था बेंगलूरु का पहला मारवाड़ी परिवार
छह महीने में यहां पहुंचे थे सिकंदराबाद
बेंगलूरु का पहला मारवाड़ी परिवार है
आज भी बेेंगलूरु में मारवाड़ी बाजार इनकी पहचान है
योगेश शर्मा
बेंगलूरु. राजस्थान के अजमेर जिले के ब्यावर निवासी दो भाई हैदान बोहरा व आगरचंद बोहरा को बेंगलूरु के पहला मारवाड़ी परिवार होने का गौरव प्राप्त है। दोनों भाई सेना के लिए बैंकिंग का कार्य करते थे और इसी कार्य के सिलसिले में राजस्थान से बेंगलूरु का सफर तय किया। एक भाई आगरचंद तो बेंगलूरु से राजस्थान चले गए लेकिन हैदान यहीं के होकर रह गए। आज यहां उनकी पांचवीं से सातवीं पीढ़ी निवास कर रही है। मारवाड़ी परिवार के लिए ही सेना ने बेंगलूरु की ग्रास कटर लेन को मारवाड़ी बाजार का दर्जा दिया जो आज तक बरकरार है।
हैदान बोहरा की पांचवीं पीढ़ी के शांतिलाल बोहरा व छठी पीढ़ी के महावीर बोहरा ने ‘पत्रिका’ से विशेष भेंट में बताया कि उनका मूल मुकाम अजमेर जिले का ब्यावर है। उनके दादा के दादाजी हैदान बोहरा व आगरचंद बोहरा अजमेर जिले के नसीराबाद स्थित सेना की पायोनियर रेजीमेंट के लिए बैंकर्स का कार्य करते थे। वर्ष 1800 में सेना की रेजीमेंट सिकंदराबाद के लिए रवाना हुई। सेना की रेजीमेंट के साथ हैदान बोहरा व आगरचंद बोहरा भी ऊंट पर सवार होकर सिकंदराबाद के लिए रवाना हो गए। सिकंदाराबाद पहुंचने में उनको करीब छह माह लगे। दोनों भाइयों ने वहां सेना की पायोनियर रेजीमेंट के लिए २५ वर्ष तक बैंकिंग का कार्य किया। इसके बाद 1825 में सेना की रेजीमेंट बेंगलूरु के लिए कूच कर गई। दोनों भाई सेना की रेजीमेंट के साथ ही बेंगलूरु आ गए। सेना ने तो छावनी में अपना डेरा जमारा लेकिन बैंकिंग कार्य करने वाले दोनों भाई हैदान बोहरा व आगरचंद बोहरा ने अपना पहला पड़ाव वन्नार पेट में जमाया। कुछ समय बाद आगरचंद तो राजस्थान लौट गए लेकिन हैदान बोहरा यहीं स्थापित हो गए और सेना के लिए कार्य करते रहे। सेना ने ही ‘ग्रास कटर लेन’ जहां वर्तमान में बोहरा परिवारों के मकान हैं उस जगह को मारवाड़ी बाजार का दर्जा दिया। उस समय काफी दूर-दूर तक कोई मकान नहीं था, केवल सेना ही रहती थी।
हैदान बोहरा की पांचवीं पीढ़ी के प्रपौत्र शांंतिलाल बोहरा ने बताया कि बेंगलूरु आने के बाद और आगरचंद के राजस्थान लौटने के बाद उनकी फर्म का नाम हैदान रामचंद्र हो गया था। उनके पूर्वजों ने सेना के लिए 1950 तक सेना के लिए बैंकिंग का कार्य किया। इसके बाद सेना की पायोनियर रेजीमेंट खत्म कर दी और सेना लौट गई। लेकिन उनका परिवार बेंगलूरु में रहने लगा और पॉन ब्रोकर्स (गिरवी) का कार्य किया। रेसकोर्स में रामचंन्द्र बोहरा के पोते मिश्रीलाल बोहरा ने पॉन ब्रोकर्स के साथ बेंगलूरु टर्फ क्लब (श्रॉफ) बेंकिंग का कार्य भी किया। यहां भी उनकी फर्म कर्मचारियों को वेतन व अन्य बेंकिंग का कार्य करती थी। वर्तमान में हैदान के परिवार में 15 सदस्य हैं।
हैदान रामचंद्र बोहरा के वंशज कमला बाई व उनके पुत्र अरुण बोहरा ने बताया कि ग्रास कटर लेन जो अब मारवाड़ी बाजार है। वहां उनका पुश्तैनी मकान है। इस मकान में आज भी पानी का कुआं है जिसमें भरपूर पानी है। इस मकान में प्राचीन ओखली भी है। पहले इस मकान में छोटे-छोटे दरवाज व खिड़कियां थीं लेकिन समय के साथ दरवाजे व खिड़कियों का आकार बड़ा किया है जबकि मकान में आज भी राजस्थान की कारीगरी बरकरार है। प्राचीन मकान को देखने के लिए अब भी लोग यहां आते रहते हैं।
वर्ष 1900 में बीजाजी का गुढ़ा पाली जिला निवासी हिम्मतमल बांठिया बेंगलूरु आए। उनका बोहरा परिवार से दोस्ताना हो गया और हिम्मतमल बांठिया के पुत्र भंवरलाल बांठिया का विवाह बोहरा परिवार में हो गया। विवाह से पूर्व उन्होंने बिशन कॉटन विद्यालय में शिक्षा ली। उस समय गिने चुने भारतीयों को बिशप कॉटन यूरोपियन विद्यालय में प्रवेश दिया जाता था। इससे पूर्व भंवरलाल बांठिया ने यहां पॉन ब्रोकर्स का कार्य किया। इसी दौरान राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कर्नाटक के राज्यपाल रहे मोहनलाल सुखाडिय़ा की प्रेरणा से उन्होंने यहां राजस्थान की कला, संस्कृति और सभ्यता को जीवित रखने के लिए यहां एक छोटी से दुकान शुरू की जो अब राजस्थान एम्पोरियम हो गई है। भंवरलाल के निधन के बाद उनके पुत्र मनोहरलाल, अशोक कुमार व राजेश बांठिया इस एम्पोरियम को संभाल रहे हैं।
राजेश बांठिया ने बताया कि बोहरा परिवार व उनके पास अंग्रेजों के जमाने की मुद्रा थी, जिस पर देश के महान नेताओं ने हस्ताक्षर हैं। इनमें अंग्रेजों के समय का दस रुपए का नोट व आजादी के बाद का दस रुपए का नोट ऐतिहासिक है। इन दोनों नोट पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री से लेकर पूर्व प्रधानमंत्रियों व प्रमुख राजनेताओं व फिल्मी हस्तियों के हस्ताक्षर भी हैं।
Published on:
25 Nov 2019 07:36 pm

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