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नेहरू की बनाई कंपनी का 90 फीसदी बाजार पर था कब्जा, टाटा ने ऐसे किया बर्बाद

HMT watches का करीब तीन दशक तक घड़ियों के बाजार पर एकछत्र राज रहा था। 1991 तक करीब 90 फीसदी बाजार पर एचएमटी का ही कब्जा था। लेकिन, फिर टाटा की एंट्री हुई और एचएमटी धीरे-धीरे खत्म होती चली गई।

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HMT watches museum, HMT Watches History

बेंगलुरु के जलहल्ली में HMT Heritage Centre and Museum में डिस्प्ले बोर्ड पर टंगी एचएमटी की घड़ियां। (फोटो सोर्स: museumsofindia.org)

साल 1961 में 28 जनवरी ही वह तारीख थी, जब बेंगलुरु की एचएमटी फैक्ट्री में कलाई घड़ी बनना शुरू हुआ था। नेहरू का जमाना था। एचएमटी भारत सरकार की कंपनी थी। इसने घड़ी बनाने के लिए जापान की कंपनी सिटिजन से समझौता किया था। पंडित नेहरू ने एचएमटी की पहली घड़ी का नाम रखा 'जनता'। यह सच में जनता की घड़ी साबित हुई। जैसे आज कुछ कारों की वेटिंग रहती है, वैसे ही लोगों को एचएमटी घड़ी के लिए कई-कई दिन इंतजार करना पड़ता था। इनकी कालाबाजारी होती थी। शादी-ब्याह या किसी भी शुभ मौके पर घड़ी तोहफे में देना शुभ और शान का प्रतीक माना जाता था।

जियो ने जो बीएसएनएल का किया वही टाटा ने एचएमटी का किया

करीब तीन दशक तक घड़ियों के बाजार पर एचएमटी का एकछत्र राज रहा। 1991 तक करीब 90 फीसदी बाजार पर एचएमटी का ही कब्जा था। लेकिन, फिर टाटा की एंट्री हुई। टाटा ने एचएमटी का हाल कुछ वैसा ही किया, जैसा आज जियो व दूसरी मोबाइल कंपनियों की वजह से बीएसएनएल, वीएसएनएल और एमटीएनएल जैसी सरकारी कंपनियों का हुआ। अब अंतिम सांसें गिन रही एचएमटी वाचेज लिमिटेड ने औपचारिक रूप से तालाबंदी की अर्जी लगा दी है।

...तो दस साल पहले ही टाटा आ जाती बाजार में

टाटा समूह को घड़ी के कारोबार में उतरने की सलाह तो 1970 के दशक में ही मिल गई थी, लेकिन इस पर अमल में देर हो गई। जुलाई 1984 में टाटा समूह ने घड़ी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया। समूह ने तमिलनाडु इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (TIDCO) के साथ टाइटन वाचेज लिमिटेड नाम से जॉइंट वेंचर बनाया। फ्रांस की एबौचेस और जापान की सिटिजन वॉच से तकनीकी जरूरतों के लिए समझौता किया गया। टाटा समूह के दिग्गज जेरक्सेस देसाई इस प्रोजेक्ट के अगुआ थे। उन्होंने बंगलुरु में एक होटल के कमरे से इसकी कमान संभाल रखी थी।

देसाई को घड़ी बनाने का आइडिया करीब दस साल पहले ही मिला था। यह आइडिया देने वाले थे एक आईएएस ऑफिसर आईएम महादेवन। महादेवन टाटा प्रेस में किसी काम से आए थे। तभी उन्होंने बातचीत के क्रम में देसाई से कहा था कि टाटा समूह को घड़ियां बनाने पर विचार करना चाहिए। यह विचार देसाई और कंपनी को पसंद भी आया, लेकिन इस पर कई साल तक कुछ काम नहीं हो सका। 1980 के दशक की शुरुआत में महादेवन TIDCO के सीएमडी बने। तब जाकर TIDCO और टाटा समूह के बीच घड़ी बनाने के लिए समझौता हुआ।

इसके कुछ साल पहले आंध्र प्रदेश सरकार की अगुआई में ऑलविन कंपनी के साथ मिलकर घड़ी बनाने के कारोबार में उतर चुकी थी। ऑलविन ने 1970 के दशक में फ्रिज के कारोबार में जबरदस्त धाक जमा ली थी। ऑलविन ने घड़ी बनाने के लिए जापान की कंपनी सीको से समझौता किया। लेकिन, वह एचएमटी का दबदबा खत्म नहीं कर सकी थी।

टाटा ने रख लिए एचएमटी के 350 बेस्ट इंजीनियर्स

लेकिन, टाटा ने बाजार में उतरते ही एचएमटी को झटके पर झटका देना शुरू किया। सबसे बड़ा झटका तो कंपनी बनाने के दो साल बाद ही दे दिया। 1986 में टाइटन ने एचएमटी के 350 बेहतरीन इंजीनियर्स को अपने यहां रख लिया। यह एचएमटी को बहुत बड़ा झटका था। कुछ समय तक उसने इसे बरदाश्त किया। 1991 में कंपनी के पास 8000 कर्मचारी थे और उस साल 300 करोड़ रुपये की घड़ियां बिकी थीं। लेकिन, लगातार टाटा के वार और निजी कंपनियों के लिए बाजार खोलने की सरकार की नीति के चलते एचएमटी कमजोर पड़ती गई।

जब निजी कंपनियों के लिए बाजार खोले जाने लगे, तब जाकर प्रतिस्पर्धा बढ़ी और एचएमटी का दबदबा धीरे-धीरे कम होने लगा। 1984 के बाद जब राजीव गांधी सरकार ने निजी कंपनियों के लिए नियम थोड़े आसान बनाने शुरू किए तब टाइटन ने भी धमाका करना शुरू किया।

33 साल में पहली बार एचएमटी को हुआ घाटा

अप्रैल, 1987 में टाइटन ने इलेक्ट्रोनिक क्वार्ट्ज घड़ियां पेश कर तहलका मचा दिया। इसके कुछ ही साल बाद, 1994 में पहली बार एचएमटी घाटे में गई। 2012-13 तक एचएमटी का घाटा 1600 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा था। कंपनी का बिक्री से राजस्व 2000-01 में 108.64 करोड़ था, जो 2012-13 में 11.06 करोड़ रह गया। सितंबर 2014 में सरकार ने धीरे-धीरे कंपनी को बंद करने का फैसला कर लिया।

टाटा ने हर मोर्चे पर खोल दिए सारे घोड़े

उधर, टाटा लगातार तरक्की की राह पर थी। लोग घड़ी को समय देखने के लिए एक मशीन के तौर पर ही देखते थे। लेकिन, टाटा ने इसे लोगों के लिए फैशन और स्टाइल का भी प्रतीक बना दिया। टाइटन ने न केवल तकनीक, डिजाइन, फीचर्स और कीमत पर ध्यान दिया, बल्कि मार्केटिंग में भी ताकत झोंक दी। हर जगह स्टोर्स खोले, जगह-जगह 'द वर्ल्ड ऑफ टाइटन' नाम से एक्सपीरियंस सेंटर खोले। टाइटन ने नेशनल सेलिंग प्राइस का कॉन्सेप्ट शुरू किया। मतलब देश भर में एक दाम पर घड़ी बेचना शुरू किया। टाटा के नाम का भी इस्तेमाल किया गया। टाटा की ओर से टाइटन- इस टैग लाइन से प्रचार करने का कंपनी को हर मोर्चे पर बड़ा फायदा हुआ।

कंपनी ने बेचने की पूरी प्रक्रिया पर बारीकी से ध्यान दिया और ग्राहकों की हर जरूरत का ख्याल रखा। करीब आधे ग्राहक लोगों को तोहफा देने के लिए घड़ी खरीदा करते थे। तो टाइटन ने खूबसूरत पैकिंग में घड़ी बेचना शुरू किया। स्टोर्स पर ग्राहकों की सुविधा का ख्याल तो रखा ही, बाहर भी पार्किंग में परेशानी नहीं हो यह सुनिश्चित किया। और, बिक्री के बाद भी सर्विस की अच्छी सुविधा दी।

दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी कंपनी बनी टाइटन, 60 फीसदी बाजार पर कब्जा

साल 2018 तक टाइटन घड़ी बनाने वाली दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी कंपनी बन गई थी। 60 फीसदी बाजार पर इसका कब्जा हो गया था। एचएमटी के मॉडल जहां कम होते गए, वहीं टाइटन के बढ़ते गए। टाइटन ने एचएमटी की तुलना में पांच गुना ज्यादा मॉडल लॉंच किए।

हर मोर्चे पर कमजोर पड़ चुकी एचएमटी का टिकना लगातार मुश्किल होता गया। सरकार ने बचाने की कोशिश की, पर लाल फीताशाही, फैसले लेने में देरी, दूसरी कंपनियों से मुक़ाबले के लिए लगातार अपडेट करने में पिछड़ना जैसे कई कारण रहे, जिससे एचएमटी के लिए बाजार में बने रहना मुश्किल हो गया। विदेशी कंपनियों के लिए बाजार खुलने के बाद होड़ और तगड़ी हो गई थी। लिहाजा अंततः 2014 में सरकार ने कंपनी को बंद करने का फैसला कर किया। आगे चल कर सीमित रूप में कंपनी का कारोबार जारी रहा, लेकिन इस साल के पहले सप्ताह में एचएमटी वाचेज लिमिटेड ने सरकार के पास तालाबंदी की अर्जी दे डाली।