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ब्रैकीथेरेपी प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को नई उम्मीद

इस विधि से मुंह, जीभ, स्तन, बच्चेदानी, त्वचा (mouth, tongue, breast, uterus, skin cancer) आदि के कैंसर का इलाज भी संभव हुआ है।

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ब्रैकीथेरेपी प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को नई उम्मीद

ब्रैकीथेरेपी प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को नई उम्मीद

प्रोस्टेट कैंसर (prostate cancer) का उपचार अब पहले से आसान और किफायती होगा। उपचार की सफलता दर बढ़ेगी। कैंसर रोग विशेषज्ञों के अनुसार बुजुर्ग ही नहीं बल्कि मध्यम आयु वर्ग के लोग भी प्रभावित हो रहे हैं। इस किफायती तकनीक से प्रोस्टेट कैंसर के विकिरण उपचार (radiation therapy) उपचार में बदलाव की उम्मीद है।

स्वस्थ ऊतकों तक रेडिएशन की न्यूनतम खुराक

रामय्या मेडिकल कॉलेज में रेडिएशन ऑन्कोलोजी विभाग के प्रमुख डॉ. कीर्ति कौशिक ने बताया कि प्रोस्टेट ब्रैकीथेरेपी (prostate brachytherapy) प्रोस्टेट कैंसर के इलाज के लिए उपयोग की जाने वाली विकिरण चिकित्सा का एक रूप है। इस विधि में रेडियोएक्टिव सोर्स (radioactive source) को शरीर के किसी भी अंग के संपर्क में रखकर उपचार किया जाता है। रेडिएशन से कैंसर ऊतकों (टिश्यू) को मारा जाता है। स्वस्थ ऊतकों को कम नुकसान पहुंचता है। क्योंकि स्वस्थ ऊतकों तक रेडिएशन की न्यूनतम खुराक पहुंचती है। डॉ. कौशिक ने बताया कि ब्रैकीथेरेपी दो प्रकार से होती है।

पहला, इंटरस्टीशियल ब्रैकीथेरेपी (इसमें नीडल टिश्यू के अंदर डालते हैं, जहां पर tumor है) है। इसमें रेडियोएक्टिव सोर्स को अंग के सीधे संपर्क में रखते हैं। दूसरा, तरीका एंट्रालुमिनल (इसमें शरीर के अंदर पहले से मौजूद छेद जैसे खाने की नली आदि में सीधे पाइप डालते हैं) है। इसमें विकिरण सोर्स को शारीरिक गुहा (कैविटी) के अंदर रखा जाता है। कंप्यूटर से संचालित इस थेरेपी के माध्यम से ट्यूमर या उसके आसपास में रेडिएशन डाला जाता है, जो जरूरत के अनुसार वहां पर रेडिएशन डोज प्रदान करती है। इस विधि से मुंह, जीभ, स्तन, बच्चेदानी, त्वचा (mouth, tongue, breast, uterus, skin cancer) आदि के कैंसर का इलाज भी संभव हुआ है।

कडैवर पर अपनी तरह का पहला परीक्षण

माउंट वर्नोन कैंसर केंद्र, यूनाइटेड किंगडम के डॉ. पीटर ओस्लर ने बताया कि हाल ही में संपन्न ब्रैकीथेरेपी कार्यशाला में देश-विदेश के 40 से भी ज्यादा रेडिएशन कैंसर रोग विशेषज्ञ शामिल हुए। Cadaver (शव) पर प्रोस्टेट ब्रैकीथेरेपी की गई। विश्व में यह अपनी तरह का पहला प्रयोग है। यह बहुत अधिक लागत प्रभावी है। कम दुष्प्रभावों के साथ सफलता दर 90 फीसदी से अधिक है।