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दीक्षांत समारोह में अब नहीं दिखेंगे ब्रिटिश गाउन और कैप

कर्नाटक Karnataka के विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोह के दौरान पहने जाने वाले पश्चिमी गाउन और कैप की परंपरा अब समाप्त होने जा रही है। उच्च शिक्षा विभाग ने निर्णय लिया है कि सभी सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोह के लिए एक समान पारंपरिक भारतीय वेशभूषा लागू की जाएगी। यह व्यवस्था डिग्री और प्रमाणपत्र प्राप्त करने […]

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कर्नाटक Karnataka के विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोह के दौरान पहने जाने वाले पश्चिमी गाउन और कैप की परंपरा अब समाप्त होने जा रही है। उच्च शिक्षा विभाग ने निर्णय लिया है कि सभी सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोह के लिए एक समान पारंपरिक भारतीय वेशभूषा लागू की जाएगी। यह व्यवस्था डिग्री और प्रमाणपत्र प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के साथ-साथ शिक्षकों और समारोह में शामिल होने वाले अतिथियों पर भी लागू होगी।

पारंपरिक भारतीय वेशभूषा लागू होगी

उच्च शिक्षा मंत्री डॉ. एम. सी. सुधाकर ने इस निर्णय की पुष्टि करते हुए कहा कि ब्रिटिश काल से चली आ रही गाउन परंपरा Gown tradition को समाप्त कर भारतीय पारंपरिक परिधान अपनाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस उद्देश्य के लिए कुलपतियों की एक समिति गठित की गई है, जो अपनी सिफारिशें जल्द ही सरकार को सौंपेगी। समिति की अनुशंसाओं के बाद औपचारिक घोषणा की जाएगी।

नया परिधान संभवत: खादी का होगा

मंत्री ने संकेत दिया कि नया परिधान संभवत: खादी Khadi का होगा। उन्होंने कहा कि कुछ विश्वविद्यालय पहले ही खादी अपना चुके हैं और पश्चिमी कैप की जगह ‘मैसूरु पेटा’ का उपयोग शुरू कर चुके हैं, लेकिन अब सभी सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में एकरूपता सुनिश्चित की जाएगी।सूत्रों के अनुसार, यह प्रस्ताव हाल ही में कुलपतियों के सम्मेलन में राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने रखा था। उन्होंने ब्रिटिश गाउन नहीं बल्कि खादी या किसी स्थानीय हैंडलूम कपड़े को अपनाने की बात कही थी। जानकारी के अनुसार महिलाओं के लिए साड़ी और पुरुषों के लिए कुर्ता-पायजामा का प्रस्ताव रखा गया है।

उस समय कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका था

मंत्री ने कहा कि परिधान का रंग सभी के लिए सफेद रहेगा। इस बीच, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग पहले ही देशभर के विश्वविद्यालयों को दीक्षांत समारोहों में हैंडलूम वस्त्र अपनाने का निर्देश दे चुका है। उल्लेखनीय है कि पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने भी पश्चिमी गाउन के स्थान पर स्वदेशी परिधान लागू करने का प्रयास किया था, हालांकि उस समय कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका था।