9 सितंबर 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

अब लोकायुक्त के खिलाफ भी जांच कर सकेंगे उपलोकायुक्त

मंत्रिमंडल की बैठक : कानून में बदलाव के प्रस्ताव का अनुमोदन
2 min read
Google source verification
vidhan

मंत्रिमंडल की बैठक : कानून में बदलाव के प्रस्ताव का अनुमोदन

बेंगलूरु. राज्य में लोकायुक्त संस्था को अधिक पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से राज्य मंत्रिमंडल ने 34 साल पुराने लोकायुक्त कानून में एक महत्वपूर्ण बदलाव के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।

प्रस्तावित संशोधन के बाद इस अद्र्धन्यायिक संस्था के प्रमुख के खिलाफ उसके अधीनस्थ को भी जांच करने का अधिकार मिल जाएगा।

इस संशोधन विधेयक के विधानमंडल से पारित होने के बाद उपलोकायुक्त को लोकायुक्त के खिलाफ उन मामलों की जांच का अधिकार मिल जाएगा जिनमें हितों के टकराव का मसला जुड़ा हो। साथ उपलोकायुक्त उन मामलों की जांच भी कर सकेंगे जिनसे लोकायुक्त ने खुद को अलग कर लिया।

मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी की अध्यक्षता में सोमवार को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में विधि व ससंदीय कार्य मंत्री कृष्णा बैरेगौड़ा ने यह जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि सरकार ने यह प्रस्ताव मौजूदा लोकायुक्त जस्टिस विश्वनाथ शेट्टी और पूर्व लोकायुक्तों से कई दौर की चर्चा के दौरान मिले सुझावों के आधार पर लाया है।

गौड़ा ने कहा कि अभी जिन मामलों से लोकायुक्त हितों के टकराव के कारण खुद को अलग कर सकते हैं उसकी परिभाषा तय होनी है लेकिन अगर लोकायुक्त अथवा उनके परिवार के किसी सदस्य के खिलाफ कोई आरोप है तो ऐसी स्थिति में उपलोकायुक्त को मामले को संज्ञान में लेने और उसकी जांच करने का अधिकार होगा।

गौड़ा ने कहा कि पहले भी कई बार यह मसला उठ चुका है कि अद्र्धन्यायिक संस्था के प्रमुख जो कि एक संवैधानिक पद है उनके खिलाफ हितों के टकराव से जुड़े मामलों की जांच कौन करे।

गौड़ा ने कहा कि एक पूर्व लोकायुक्त पर लगे आरोपों के बाद इस तरह के बदलाव की जरुरत महसूस की जा रही थी। गौड़ा ने कहा कि इस मसले पर बैठक में काफी चर्चा हुई।

इस बात पर भी सहमति बनी कि उपलोकायुक्तों के क्षेत्राधिकार में यह भी तय कर दिया जाए कि अपने अथवा परिजनों से जुड़े मामलों से लोकायुक्त के अलग होने के बाद उसकी जांच कौन करे।

गौरतलब है कि पूर्व लोकायुक्त जस्टिस भास्कर राव के बेटे खिलाफ लोकायुक्त की जांच के दायरे में आने वाले सरकारी कर्मचारियों से वसूली के आरोप लगे थे, जिससे लोकायुक्त संस्था की विश्वसनीयता को लेकर सवाल भी उठे थे।

कई महीने तक विवादों के कारण कार्यालय नहीं आने के बाद राव ने त्याग पत्र दे दिया था। इसके बाद सरकार ने लोकायुक्त कानून में कई बदलाव कर लोकायुक्त को हटाने का प्रावधान जोड़ा गया था।

साथ ही लोकायुक्त के अधिकारों में भी कटौती की गई थी, जिसके कारण अब यह संस्था नख-दंत विहीन जैसी हो गई है।

इसके बाद ही सिद्धरामय्या के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने अलग से भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो का गठन भी किया। ब्यूरो के गठन के चुनौती देने वाली एक याचिका अभी उच्च न्यायालय में लंबित है।