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सत्यापन समिति निर्धारित करेगी पूर्व विधायक मंजुनाथ की जाति

सुप्रीम कोर्ट ने कहा मामला बेहद जटिलअप्रेल 2018 में हाइकोर्ट ने मंजुनाथ को अयोग्य करार दिया था

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सत्यापन समिति निर्धारित करेगी पूर्व विधायक मंजुनाथ की जाति

सत्यापन समिति निर्धारित करेगी पूर्व विधायक मंजुनाथ की जाति

बेंगलूरु.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की जाति सत्यापन समिति को निर्देश दिया है कि इस बात की जांच करे कि मुलबागल के पूर्व विधायक जी.मंजुनाथ 'बुडगा जंगम' नामक अनुसूचित जाति (एससी) से ताल्लुक रखते हैं और कर्नाटक में बैरागी जाति अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अंतर्गत आती है।
दरअसल, कोलार जिले के मुलबागल विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय निर्वाचित जी.मंजुनाथ को अवैध जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के आरोप में कर्नाटक हाइकोर्ट ने 25 अप्रेल 2018 को अयोग्य करार दिया था। मुलबागल विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है और नामांकन भरते समय जी.मंजुनाथ ने खुद को बैरागी जाति का बताते हुए प्रमाण पत्र पेश किया था। वे निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीते भी गए। चुनाव के बाद उनके निकटतम प्रतिद्वंदी रहे जनता दल-एस के उम्मीदवार एन. मुनियंजप्पा ने मंजुनाथ के नामांकन पत्र को स्वीकारने और निर्वाचन को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। मुनियंजप्पा का आरोप था कि मंजुनाथ ने गलत जाति प्रमाण पत्र पेश किया है। कर्नाटक हाइकोर्ट ने मुनि अंजनप्पा की याचिका को स्वीकार करते हुए मंजुनाथ के निर्वाचन को रद्द करार दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि मंजुनाथ का नामांकन पत्र स्वीकारना और चुनाव परिणाम की घोषणा अवैध थी क्योंकि मंजुनाथ बैरागी जाति से हैं जो अन्य पिछड़ा वर्ग मेें आता है। मंजुनाथ यह साबित नहीं कर पाए कि वह अनुसूचित जाति में आने वाले बुडगा जंगम जाति से हैं। हाइकोर्ट के फैसले को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
बुडगा जंगम राज्य में माला संन्यासी, बैरागी नाम से भी मशहूर
इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़े, बीआर गवई और सूर्यकांत की पीठ ने उल्लेख किया कि यह एक जटिल मामला है। पीठ ने कहा कि 'दो जातियों के व्यवसाय, आदतें, रीति-रिवाज, चलन और मान्य देवाताओं से जटिलता उत्पन्न होती है। एक जटिलता इस तथ्य से भी उत्पन्न होती है कि कोलार गजेटियर में कहा गया है कि बुडगा जंगम जाति के व्यक्ति राज्य के दूसरे हिस्सों में 'माला संन्यासीÓ, बैरागी जैसे नामों से भी जाने जाते हैं। इसपर अदालत को सूचित किया गया कि राज्य ने एक विशेषज्ञ समिति का गठित की है ताकि रोजगार या शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए आरक्षण का दावा करने वाले विभिन्न जातियों के उम्मीदवारों का निर्धारण किया जा सके।
तीन महीने की समय सीमा तय
अदालत ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए मंजुनाथ के जाति संबंधी दावे को समिति के पास भेजने का फैसला किया। अदालत ने मंजुनाथ की जाति का निर्धारण करने के लिए समिति को तीन महीने का समय दिया। शीर्ष अदालत ने समिति से यह भी कहा कि इस संबंध में सभी पक्षों को मौखिक रूप से सुनने और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दें। तमाम पक्षों को सुनने और दस्तावेजी साक्ष्य के आधार पर तीन महीने में मंजुनाथ की जाति निर्धारित करें। इस मामले पर अब साढ़े तीन महीने बाद फिर से सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी।
वेतन भत्तों पर लगी थी रोक
इससे पहले शीर्ष अदालत ने अप्रेल 2019 में मंजुनाथ को वेतन एवं अन्य भत्तों के तौर पर 90 लाख रुपए से अधिक की वसूली के लिए जारी आदेश पर रोक लगा दी थी। गौरतलब है कि मंजुनाथ बाद में कांग्रेस में शामिल हो गए थे। इसके बाद वर्ष 2018 के विधानसभा चुनावों में नामांकन के समय भी इसको लेकर विवाद हुआ था। सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के बाद भविष्य में इन दो जातियों को लेकर स्थिति स्पष्ट हो जाएगी।