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जीवन चाहिए तो बदलिए जीवनशैली

आचार्य चन्द्रयश सूरीश्वर से बातचीत

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जीवन चाहिए तो बदलिए जीवनशैली

जीवन चाहिए तो बदलिए जीवनशैली

संयम, सदाचार, सहिष्णुता व समन्वय के मार्ग पर चलने वाले संत भारतीय संस्कृति के प्राण रहे हैं। सदियों से संतों ने ही समाज को उचित-अनुचित, धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य का विवेक दिया, सत्य की राह दिखाई और इस पर चलने की शक्ति और प्रेरणा भी दी। संतों की इसी शक्ति के समक्ष देश नतमस्तक होता रहा है। देश में जगह-जगह लगने वाले महाकुंभ हों या संतों के चार माह के चातुर्मासिक प्रवास, यही अगाध श्रद्धा समाज को संतों के चरणों में खींच लाती है। यह संयोग ही है कि इस बार चातुर्मासिक प्रवास ऐसे समय में हो रहा है जब पूरा विश्व कोरोना संक्रमण के खतरे से जूझ रहा है। ऐसे में एक बार फिर समाज राह दिखाने की प्रार्थना और उम्मीद लिए संतों की ओर देख रहा है। आखिर कौन सा रास्ता है,क्या किया जाए, क्या है संतों का संदेश। संतों व समाज के बीच सेतु की भूमिका निभाते हुए पत्रिका शुरू कर रहा है यह खास कॉलम : संत-सरिता। पहली कड़ी में प्रस्तुत हैं आचार्य चंद्रयश सूरीश्वर से बातचीत के अंश :

योगेश शर्मा
बेंगलूरु. देवनहल्ली स्थित सिद्धाचल स्थूलभद्रधाम में विराजित आचार्य चन्द्रयश सूरीश्वर ने कहा कि वर्तमान कोरोना काल में राजनेताओं, चिकित्सकों और आम जनता को जीवन की शैली बदलनी पड़ेगी। सोच बदलनी होगी। राजनेताओं को भगवान महावीर के सिद्घांत अहिंसा परमो धर्म: और चिकित्सकों को शाकाहार का संदेश देना होगा। जीवों का शिकार बहुत बड़ी बद्दुआ है। यह बददुआ ही महामारी बनी है। यदि जीवों की हत्या नहीं रुकी तो आने वाले समय में महामारी के पुन: आने से इन्कार नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री और राजनेताओं को जीव हिंसा रोकने के लिए पहल करनी चाहिए। पशु पक्षियों को भी जीने का अधिकार है। मांस के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगाई जानी चाहिए।
कर्म से दुख धर्म से सुख
आचार्य ने कहा कि वैश्विक महामारी के समय में सभी जीवों के लिए भगवान महावीर के दो सिद्धांत हैं। इनमें पहला कर्म से दुख आता है और धर्म से सुख आता है। इन दो बातों को व्यक्ति स्वीकार करे और कर्म के सिद्धांतों का चिंतन करे तो निश्चित ही मनोबल को दृढ़ बना लेता है।
उन्होंने कहा कि कर्म चाहे कभी भी किए हों, वह एक स्टॉक की तरह होता है। उदय में आता है तब सारी परेशानियां पैदा होती हैं। व्यक्ति को अपने जीवन में कर्म और धर्म का सिद्धांत सामने रखकर जीना चाहिए। कर्म कभी भी आत्मा को छोड़ता नहीं है। हमें कर्म से ज्यादा धर्म की आराधना करनी चाहिए। धर्म कभी निष्फल नहीं जाता।
आचार्य ने महामारी से निपटने के लिए कई मंत्रों का जाप करने की सलाह भी दी। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति धर्म में जीवन जीता है वह अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण कर लेता है। वासनाओं पर नियंत्रण कर लेता है। यहीं से नैतिक जीवन शुरू होता है।
धर्म अध्यात्म की पहली सीढ़ी
आचार्य ने कहा कि धर्म और अध्यात्म पर्यायवाची हैं। धर्म को हम समझकर आचरण में ढालते हैं तो वह अध्यात्म में परिवर्तित हो जाता है। धर्म अध्यात्म की पहली सीढ़ी और अध्यात्म एक शिखर है।
ध्यान रखें, धर्म आडम्बर नहीं
उन्होंने कई सदियों के बाद चातुर्मास के बदले स्वरूप के बारे में कहा कि चातुर्मासिक आराधना घर बैठकर भी की जा सकती है। वर्तमान में हजारों श्रावक ग्रंथों के माध्यम से स्वाध्याय करके आराधना कर रहे हैं। जरूरी नहीं है कि ऐसी विकट स्थिति में सामूहिक रूप से एकत्रित हों। घर-घर में भगवान की वाणी का श्रवण करे जिससे स्वयं सुरक्षित रहेंगे, राष्ट्र सुरक्षित रहेगा, संत भी आराधना में लीन रहेंगे। ध्यान रखें, धर्म आडम्बर नहीं, धर्म एक भक्ति है।
उन्होंने कहा कि कोरोना के समय में जितनी बड़ी कोरोना की समस्या नहीं है उससे ज्यादा कोरोना की सोच की समस्या है। इसके बारे में ज्यादा सोच कर अवसाद में रहना जरूरी नहीं है। कोरोना के बारे में सारे लोग एक हो जाएं इसे दृढ मन से स्वीकार करें, जो है वह है। हमें मंत्रों से आभा मंडल को पॉजिटिव करना है।