
child marriage
बेंगलूरु. शिक्षा के प्रसार और जागरूकता के बढऩे के बावजूद बाल विवाह (Child Marriage) की प्रथा देश में पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है। कोरोना महामारी (corona pandemic) के बीच बाल विवाह के मामलों में करीब 50 प्रतिशत वृद्धि हुई है। विशेषज्ञों ने इसकी आशंका पहले ही जताई थी और सरकारों को चेताया भी था। हालांकि, बाल विवाह से जुड़े मामलों में अभियोजन दर सिर्फ 16 प्रतशित है जबकि सुनवाई के लिए अदालतों में पहुंचे 98 प्रतिशत मामले लंबित हैं। मनोचिकित्सकों का कहना है कि बाल विवाह बच्चियों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बेहद खतरनाक व चिंताजनक है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में बाल विवाह के मामलों में पिछले वर्ष की तुलना में करीब 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि डेटा न केवल यह बताता है कि इन मामलों में वृद्धि हुई है बल्कि ऐसे मामलों की शिकायतें दर्ज कराने में भी वृद्धि दर्ज की गई है।
पांच राज्यों में 361 मामले
एनसीआरबी (National Crime Records Bureau) के आंकड़ों के अनुसार बाल विवाह निषेध अधिनियम के तहत 21 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 785 मामले दर्ज किए गए। कर्नाटक में सबसे ज्यादा 184 मामले दर्ज हुए हैं। आंकड़ों के मुताबिक इनमें से करीब 46 प्रतिशत मामले पांच दक्षिणी राज्यों- कर्नाटक, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल के हैं। इन राज्यों में 361 मामले दर्ज किए गए।
धीमी जांच, सुनवाई लंबित
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2020 में पुलिस के पास बाल विवाह से जुड़े जांच के लिए 1174 मामले थे, जिसमें से 389 पिछले साल के थे। पुलिस ने 505 मामले मेें आरोप पत्र दाखिल किया जिसमें से 175 पुराने और 330 नए मामले शामिल थे जबकि 560 मामलों की जांच लंबित थी। पिछले साल के 1587 और 2020 के 505 सहित 2092 मामले सुनवाई के लिए अदालतों में पहुंचे, जिसमें से 2056 लंबित रहे। 36 मामलों का निपटारा हुआ। छह मामलों में अभियोजन हुआ।
सेव द चिल्ड्रन फाउंडेशन के अनुसार कोरोना महामारी के कारण भी बाल विवाह में वृद्धि हुई है और यह कुछ ऐसा है जो समुदायों में देखा जा रहा है।अधिकारियों का कहना है कि महामारी के दौरान बाल विवाह तेजी से बढ़े हैं। जिन गांवों में कई सालों से एक भी बाल विवाह नहीं हुआ है, उन्हें अब शादियों रोकने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ रहा है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़े हुए मामले कई कारणों से हो सकते हैं। किशोर लड़कियों के प्यार में पडऩे और भाग जाने और शादी करने की घटनाओं में वृद्धि हुई है। ये घटनाएं बहुत अलग हैं।
जागरूकता के कारण भी सामने आर रहे मामले
महिला एवं बाल विकास विभाग के निदेशक के. ए. दयानंद के अनुसार मामलों में वृद्धि का कारण जागरूता अभियान भी हैं। महिलाओं से जुड़ी हेल्पलाइन संख्या 181 इसमें मददगार साबित हुई है। हेल्प लाइन पर शिकायत या सूचना मिलने के कारण बाल विवाह के ज्यादातर मामलों को रोकने में सफलता मिली है। लॉकडाउन और कोरोना महामारी में व्यस्त होने और अधिकारियों की संख्या कम होने के बावजूद कई विवाह रोके गए। संबंधितों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए।
अभिभावकों ने मौके का फायदा उठाया
कर्नाटक प्रदेश बाल संरक्षण आयोग (केएससीपीसीआर) के अध्यक्ष डॉ. सेबेस्टियन एंथोनी ने बताया कि एक तरफ प्रशासन कोरोना महामारी से निपटने में व्यस्त था तो दूसरी ओर अभिभावकों ने मौके का फायदा उठाया। लॉकडाउन के कारण ऐसी कई शादियों पर नजर नहीं गई। स्कूल और कॉलेज बंद होने के कारण लड़कियों की अनुपस्थिति के मामलों पर नजर रखना मुश्किल था।
केएससीपीसीआर के आंकड़ों के अनुसार गत वर्ष अप्रेल-जुलाई के बीच प्रदेश में बाल विवाह के 107 मामले सामने आए हैं जबकि गत वर्ष 156 मामले ही सामने आए थे। लेकिन, नोडल एजेंसी चाइल्ड लाइन ने गत वर्ष मार्च और जून के बीच 550 से ज्यादा ऐसे विवाहों को रोका भी था। बल्लारी, मैसूरु, बागलकोट, धारवाड़ और बेलगावी जिलों में सर्वाधिक मामले सामने आए थे।
देश में मामले
2020 - 785
2019 - 523
2018 - 501
2017 - 395
2016 - 326
2015 - 293
Updated on:
22 Sept 2021 04:55 pm
Published on:
22 Sept 2021 04:36 pm
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