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सिजोफ्रेनिया के मरीजों के लिए शास्त्रीय संगीत फायदेमंद

राष्ट्रीय मानसिक आरोग्य व स्नायु विज्ञान संस्थान (निम्हांस) के शोधकर्ताओं को उनके एक अध्ययन में इसके प्रमाण मिले हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार देश में इस तरह का यह पहला अध्ययन है।

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निम्हांस

निम्हांस का दौरा कर दूर करें भ्रम

-मस्तिष्क के संज्ञानात्मक क्रिया में सुधार

-निम्हांस के शोधकर्ताओं को अध्ययन में मिले प्रमाण

बेंगलूरु.

सिजोफ्रेनिया (schizophrenia) के मरीजों के लिए शास्त्रीय संगीत फायदेमंद साबित हो सकता है। इससे मरीज की संज्ञानात्मक क्रिया (cognitive functions) बेहतर हो सकती है। बेहतर प्रतिक्रिया समय और एकाग्रता में सुधार संभव है। राष्ट्रीय मानसिक आरोग्य व स्नायु विज्ञान संस्थान (National Institute of Mental Health and Neurosciences) के शोधकर्ताओं को उनके एक अध्ययन में इसके प्रमाण मिले हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार देश में इस तरह का यह पहला अध्ययन है।

आशाजनक खोज
शोधकर्ताओं ने न्यूरोसाइकैट्रिक विकारों और बीमारियों के उपचार में इसे बहुत आशाजनक खोज बताया है। इसी तर्ज पर भविष्य में किए गए अध्ययन, संगीत आधारित हस्तक्षेपों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने में मददगार साबित हो सकते हैं। मरीजों को समाज की मुख्य धारा से जोडऩे व उन्हें काम करने लायक बनाने के लिए संज्ञानात्मक कार्यों में सुधार उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

10 मिनट तक राग भूपाली सुनाया गया
निम्हांस में न्यूरोसाइकोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर और संगीत अनुभूति प्रयोगशाला की प्रभारी डॉ. शांताला हेगड़े की अगुवाई में संगीत अनुभूति प्रयोगशाला में किए गए सिजोफ्रेनिया के मरीजों में 'पी-300 इआरपी (इवेंट रिलेटेड पोटेंशियल) पर संगती सुनने के प्रभाव' शीर्षक अध्ययन में 18 से 45 आयुवर्ग के सिजोफ्रेनिया के 20 पुरुष मरीजों को शामिल किया गया। संगीतकार पंडित शिवकुमार शर्मा और पंडित हरिप्रसाद चौरसिया द्वारा शास्त्रीय राग भूपाली (Raag Bhoopali) 10 मिनट तक सुनाया गया। भूपाली चंद्र प्रकाश के समान शांत स्निग्ध वातावरण पैदा करने वाला मधुर राग है।

ध्यान और कार्य स्मृति को दर्शाता है
डॉ. हेगड़े ने बताया कि इस दौरान इलेक्ट्रोएंसेफलोग्राम (इइजी) - इवोक्ड रेस्पॉन्स पोटेंसियल (इआरपी) प्रणाली के माध्यम से 32 चैनलों का उपयोग कर मस्तिष्क की विद्युत तरंगों की गतिविधियों का अध्ययन किया गया। इस विशिष्ट विधि का उपयोग यह अध्ययन करने के लिए किया जाता है कि पी-300 के रूप में जाने जाने वाले संगीत को सुनने पर मरीजों का ध्यान कैसे और कितना बेहतर होता है। पी-300 को, मस्तिष्क में एक विशिष्ट उत्तेजना के 300 मिलीसेकेंड के बाद मस्तिष्क की गतिविधियों के संकेत के रूप में भी समझा जा सकता है जो ध्यान और कार्य स्मृति को दर्शाता है। मस्तिष्क की कोशिकाएं विद्युत आवेगों के माध्यम से एक दूसरे के साथ संपर्क करती हैं। इइजी प्रक्रिया का इस्तेमाल इन गतिविधियों से जुड़ी समस्याओं का पता लगाने के लिए किया जाता है।

बेहतर प्रतिक्रिया समय और एकाग्रता का परिचय
डॉ. हेगड़े ने बताया कि संगीत सुनने के बाद मरीजों ने बेहतर प्रतिक्रिया समय और एकाग्रता का परिचय दिया। वे उन कार्यों को बेहतर तरीके से कर सके जिसमें में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत पड़ती है। मस्तिष्क के टेमपोरल (लौकिक) क्षेत्र के इलेक्ट्रोड के एंप्लीट्यूड (आयाम) में वृद्धि दर्ज की गई। इतना ही नहीं, आम अवस्था की तुलना में संगीत सुनने के दौरान सभी इलेक्ट्रोड के एंप्लीट्यूड बढ़े। ललाट और केंद्रीय इलेक्ट्रोड क्षेत्र के मध्य एंप्लीट्यूड में भी महत्वपूर्ण बदलाव दिखा। पावर स्पेक्ट्रल विश्लेषण में संगीत सुनने के दौरान अल्फा और थीटा गतिविधियों में थोड़ी वृद्धि के संकेत मिले।

तंत्रिका विज्ञान मॉडल पर आधारित
डॉ. हेगड़े ने कहा कि उनकी जानकारी के अनुसार सिजोफ्रेनिया के मरीजों में पी-300 इआरपी पर संगती सुनने के प्रभाव पर पहले कोई अध्ययन नहीं किया गया है। अब तक सिजोफ्रेनिया के मरीजों के उपचार व प्रबंधन में संगीत थेरेपी का इस्तेमाल जरूर हुआ है। लेकिन यह सामाजिक विज्ञान मॉडल (social science model) पर हुआ है न कि तंत्रिका विज्ञान मॉडल पर। सामाजिक विज्ञान मॉडल में संपूर्ण मानसिक स्वास्थ्य, जीवन की गुणवत्ता में सुधार सहित सकारात्मक और नकारात्मक लक्षणों को लक्षित किया गया है। जबकि तंत्रिका विज्ञान मॉडल (neuroscience model) में संज्ञानात्मक कार्यों को लक्षित किया गया है।