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जागरूकता की कमी से बढ़ रहे डिमेंशिया और अल्जाइमर के मामले

- 10 में से एक को ही निदान, देखभाल या उपचार प्राप्त

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जागरूकता की कमी से बढ़ रहे डिमेंशिया और अल्जाइमर के मामले

जागरूकता की कमी से बढ़ रहे डिमेंशिया और अल्जाइमर के मामले

विश्व अल्जाइमर दिवस पर विशेष

बेंगलूरु. डिमेंशिया भारत में तंत्रिका संबंधी विकारों के कारण होने वाली कुल मौतों का दूसरा प्रमुख कारण है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि भारत में 2019 में 3.8 मिलियन लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे थे। इस संख्या के वर्ष 2050 तक 197 फीसदी बढ़कर 11.4 मिलियन होने की उम्मीद है। जागरूकता की कमी और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण देश में डिमेंशिया और अल्जाइमर यानी याददाश्त कम होने की बीमारी के 90 फीसदी मरीजों की पहचान नहीं हो पाती है। हाल के ही वैज्ञानिक शोधों के अनुसार डिमेंशिया के 40 फीसदी मामले जीवनशैली से जुड़े हैं।

41 फीसदी मामलों को टालना संभव
राष्ट्रीय मानसिक आरोग्य व स्नायु विज्ञान संस्थान (NIMHANS) के न्यूरोलोजिस्ट डॉ. सुवर्णा ए. ने बताया कि अल्जाइमर डिमेंशिया का सबसे आम कारण है। ब्रेन स्ट्रोक, संक्रमण, पोषण संबंधी कमियां और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां भी डिमेंशिया का कारण बनती हैं। उच्च आय वाले देशों में डिमेंशिया का बोझ कम हो रहा है जबकि भारत जैसे देशों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। हाल के शोध ने संकेत दिया है कि कम शिक्षा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा, सामाजिक अलगाव, अवसाद, शारीरिक निष्क्रियता, धूम्रपान, शराब, श्रवण हानि और वायु प्रदूषण जैसे प्रमुख जोखिम कारकों के समाधान से Dementia के 41 फीसदी मामलों को संभावित रूप से रोका या विलंबित किया जा सकता है।

विशेषज्ञों की कमी बड़ी चुनौती
निम्हांस के अनुसार भारत में डिमेंशिया के 10 में से केवल एक मरीज को ही कोई निदान, देखभाल या उपचार प्राप्त होता है। यह बड़ा उपचार अंतर जागरूकता की कमी, कलंक, सीमित उपलब्धता और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच नहीं होने के कारण है। इसके अलावा डिमेंशिया के निदान और उपचार के लिए प्रशिक्षित बहु-विषयक देखभाल विशेषज्ञों की कमी है। डिमेंशिया को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में लेने और सरकारी कार्यक्रमों व सरकारी नीतियों को गंभीरता से लागू करने की जरूरत है।

10-15 वर्ष पहले अल्जाइमर को भांपना संभव
ब्रेन्स अस्पताल के संस्थापक व वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. एन. के. वेंकटरमन ने बताया कि Alzheimer के प्रमुख कारणों में से एक मस्तिष्क में न्यूरॉन्स के आसपास समूहों में एमाइलॉइड-बीटा (एबी) नामक एक प्रोटीन का संचय है, जो उनकी गतिविधि को बाधित करता है। पतन या बिगडऩे को ट्रिगर करता है। दरअसल एबी एक बड़ा पेप्टाइड है, जिसमें 39 और 43 एमिनो एसिड होते हैं। मस्तिष्क के न्यूरॉन्स एबी प्लेग (पट्टिका) से भरे होते हैं। इस प्लेग के उतपन्न होने के बाद अल्जाइमर के लक्षण प्रकट होने में 10-15 वर्ष लग जाते हैं। जबकि उन्नत एमआरआइ से समय रहते प्लेग की पहचान संभव है।