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टीका होने के बावजूद रेबीज बना काल

- कर्नाटक में 19 महीने में 66 लोगों ने गंवाई जान - विश्व रेबीज दिवस (World Rabies Day)

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टीका होने के बावजूद रेबीज बना काल

निखिल कुमार

टीका होने के बावजूद Rabies से मौतों का सिलसिला जारी है। राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार Karnataka में वर्ष 2022 में रेबीज से 41 लोगों की मौत हुई जबकि इस वर्ष जुलाई तक 25 लोग जान गंवा चुके हैं। इन मौतों को देखते हुए राज्य सरकार ने गत वर्ष पांच दिसंबर को एक आदेश जारी कर ह्यूमन रेबीज को अधिसूचित बीमारियों की श्रेणी में शामिल किया था। विशेषज्ञों के अनुसार रेबीज उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीआरइ) की घोषणा 2021 में की गई थी।

वर्ष 2030 तक रेबीज को समाप्त करने के वैश्विक लक्ष्य में भारत भी शामिल है। इसके करीब दो वर्षों के बाद भी रेबीज उन्मूलन-केंद्रित कार्यक्रम को लेकर राज्य स्तर पर भी गंभीरता की कमी है।

ट्रैक, रिकॉर्ड और निगरानी प्रणाली कमजोर

ह्यूमेन सोसाइटी इंटरनेशनल (भारत) में आवारा कुत्ता कार्यक्रम की वरिष्ठ निदेशक केरेन नाजरेथ ने बताया कि एंटी-रेबीज टीकाकरण को ट्रैक, रिकॉर्ड और निगरानी करने के लिए एक मजबूत प्रणाली की कमी है। स्टेरेलाइज्ड कुत्तों को अधिक आसानी से ट्रैक और गिना जा सकता है, लेकिन टीकाकरण के मामले में ऐसा नहीं है।

पशु जन्म नियंत्रण (एबीसी) कार्यक्रम भारत में रेबीज की ट्रैकिंग, रिकॉर्डिंग और निगरानी के लिए एक उपकरण बन सकता है। एबीसी और एनएपीआरइ को मजबूती से लागू करना जरूरी है।

100 प्रतिशत घातक

रेबीज के प्रारंभिक लक्षणों में बुखार, दर्द और घाव स्थल पर असामान्य या अस्पष्ट झुनझुनी, चुभन या जलन जैसे सामान्य लक्षण शामिल हैं। जैसे ही वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में पहुंचता है, मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में प्रगतिशील और घातक सूजन विकसित हो जाती है। एक बार नैदानिक लक्षण प्रकट होने पर रेबीज 100 प्रतिशत घातक होता है।

जागरूकता ही बचाव

विशेषकर बच्चों को समझाएं कि कुत्ता काट ले तो वे माता-पिता या परिवार के किसी भी सदस्य को इसकी जानकारी फौरन दें।

ऐसी परिस्थितियां उन्हें आक्रामक बनाती हैं

कुत्तों के काटने के ज्यादातर मामले इलाके की लड़ाई और सुरक्षा से जुड़े होते हैं। Stray dogs के मामलों में बढ़ता तापमान, खाने की कमी, ट्रैफिक का शोर, तेज चकाचौंध रोशनी जैसे कारक भी असर डालते हैं। ऐसी परिस्थितियां उन्हें आक्रामक बनाती हैं।

राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम लागू

बच्चों के कुत्तों द्वारा काटे जाने के ज्यादातर मामलों को माता-पिता, रिश्तेदार या तो गंभीरता से नहीं लेते हैं या फिर भय आदि के कारण बच्चे घटना की जानकारी नहीं देते हैं। इससे मौतों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। रेबीज के उन्मूलन के मार्गदर्शन के लिए राज्य, जिला और बीबीएमपी क्षेत्रों में एक संयुक्त संचालन समिति का गठन किया गया है। बेंगलूरु, मेंगलूरु, मैसूरु, बेलगावी और हुब्बल्ली-धारवाड़ जिलों को रेबीज मुक्त बनाने के लिए एक कार्य योजना बनाई जा रही है। राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों में राष्ट्रीय रेबीज नियंत्रण कार्यक्रम लागू किया गया है।

-दिनेश गुंडूराव, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री