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वॉरियर से ‘कोरोना वीर’ बने डॉ. सोलंकी

- कोविड-19 से जंग- नौ दिनों तक अस्पताल में जारी रही लड़ाई

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वॉरियर से 'कोरोना वीर' बने डॉ. सोलंकी

वॉरियर से 'कोरोना वीर' बने डॉ. सोलंकी

बेंगलूरु. देश सहित प्रदेश में भी सैकड़ों चिकित्सक कोरोना वायरस से संक्रमित हुए हैं। स्वस्थ होने के बाद मरीजों की सेवा में तैनात हैं। इन्हीं योद्धाओं में शामिल हैं राजस्थानी मूल के नेत्र रोग विशेषज्ञ व डॉ. सोलंकी आई अस्पताल के अध्यक्ष डॉ. नरपत सोलंकी (Dr. Narpat Solanki)। इन्होंने करीब दो सप्ताह की लड़ाई के बाद कोरोना से जिंदगी की जंग जीती है और अब पहले की तरह ही पूरी शिद्दत के साथ सेवा में जुट गए हैं।

मजबूत मानसिकता के साथ डटकर मुकाबला

डॉ. सोलंकी (63) ने लोगों से अपील की है कि वारयस से घबराए नहीं और मजबूत मानसिकता के साथ डटकर मुकाबला करें। अफवाहों पर ध्यान न दें, जिनका उपचार चल रहा है वे पॉजिटिव रहें और उम्मीद न छोड़ें। भीड़भाड़ वाले इलाकों से बचें, हाथों की स्वच्छता का ख्याल रखें और सही तरीके से मास्क का इस्तेमाल करें। बुखार के पहले तीन दिन के बाद ही कोविड जांच कराना बेहतर है। तब तक होम आइसोलेशन में रहें। बुजुर्ग हों या और कोई बीमारी हो तो कोविड के किसी भी लक्षण को नजरअंदाज नहीं करें और फौरन चिकित्सकीय सलाह लें। उबरने के बाद भी कोविड दिशा-निर्देशों का पालन करें, कोविड मुक्त मधुमेह के मरीज अगले कुछ माह तक इंसुलिन जारी रखें, डिस्चार्ज के बाद भी चिकित्सक ने अगर ऑक्सीजन जारी रखने की सलाह दी हो तो इसे नजरअंदाज नहीं करें। इससे फेफड़ों पर दबाव नहीं पड़ेेगा।

ड्यूटी के दौरान हुए संक्रमित

डॉ. सोलंकी ने बताया कि मरीजों के उपचार के दौरान वे खुद संक्रमित हो गएं। गले में खराश के साथ बुखार आया तो सामान्य लगा। तीसरे दिन से दस्त की शिकायत शुरू हो गई। सामान्य दवा लेने के तीन दिनों बाद तक तबीयत नहीं सुधरी तो कोविड जांच कराया, अगले दिन रिपोर्ट पॉजिटिव आई। शुरुआती दिनों में घर में ही आइसोलेट रहा लेकिन परिजनों के संक्रमित होने की चिंता सताती थी। उच्च रक्तचाप व मधुमेह के मरीज होने के कारण नौ दिनों तके अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। स्टेरॉयड लेने से शुगर लेवल बढ़ गया। इंसूलिन की जरूरत पड़ी। कोविड में कमजोरी बहुत होती है, इससे घबराएं नहीं, आराम बेहद जरूरी है। व्यक्तिगत अनुभव कहता है कि हृदय के मरीज हों या नहीं, कोविड से उबरने के दो से तीन माह तक ब्लड थिनर्स जरूरी है। भविष्य में होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है।

खुद को भी पॉजिटिव रखने की जरूरत

उबरने के बाद पत्रिका से अपने अनुभव साझा करते हुए डॉ. सोलंकी ने कहा कि संक्रमण शरीर को पूरी तरह से तोड़ देता है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद मरीज अलग- थलग महसूस करता है। अकेलापन काटने को दौड़ता है। कई तरह के अनावश्यक ख्याल मन में आते हैं। उनके साथ कुछ ऐसा ही हुआ लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे ठीक से सो नहीं पा रहे थे, बदन में कुछ चुभ सा रहा था, सांस लेने में कोई विशेज्ञ दिक्कत नहीं हुई और खांसी भी नहीं थी। इसलिए सांस लेने में दिक्कत या खांसी ही केवल कोविड के लक्षण नहीं हैं।

सकारात्मक सोच, चिकित्सकों और नर्सों सहित परिजनों के साथ ने उबरने में काफी मदद की। विडियो कॉलिंग के जरिए परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों के लगातार संपर्क में रहे। सह मरीजों से बातचीत करते थे। इससे बीमारी से ध्यान हटाने में मदद मिली। जो बेहद जरूरी है। उचित उपचार, दृढ़ इच्छाशक्ति व सकारात्मक सोच के बल पर यह जंग जीती जा सकती है।