
इस वजह से राजनीति में नहीं आए राजकुमार
राजनीति का मोहरा नहीं बनना चाहते थे डॉ. राजकुमार
अभिनेता राघवेंद्र राजकुमार ने खोला राज
डॉ. बरगूरु रामचंद्रप्पा लिखित 'जननेता डॉ. राजकुमारÓ पुस्तक का विमोचन
बेंगलूरु. व्यापक लोकप्रियता के बावजूद डॉ. राजकुमार ने क्यों राजनीति में प्रवेश नहीं किया? इस बात को लेकर कई कयास लगाए जाते थे। ऐसे कयासों पर उनके पुत्र अभिनेता राघवेंद्र राजकुमार ने विराम लगाया है।
उन्होंने राजकुमार के राजनीति से दूर रहने के बारे में रविवार को कन्नड़ साहित्य परिषद के सभागार में साहित्यकार डॉ. बरगूरु रामचंद्रप्पा द्वारा लिखी गई पुस्तक 'जननेता डॉ. राजकुमारÓ के विमोचन समारोह में इस बारे में विस्तार से बताया है।
राघवेन्द्र ने कहा कि राजकुमार स्वयं को राजनीति का मोहरा नहीं बनाना चाहते थे, इसलिए राजनीति से दूर रहे। राजनीति में व्यक्ति को केवल एक मोहरे की तरह उपयोग किया जाता है। अगर ये मोहरा नहीं चलता है तो पार्टियां उस व्यक्ति से मुंह फेर लेते हैं। राजनीति से दूर होने के बावजूद जब भी राज्य में कन्नड़ भाषा, संस्कृति की रक्षा के लिए कोई अभियान चलाए गए, तो डॉ. राजकुमार ने जनता की अपेक्षा के तहत ऐसे अभियानों का नेतृत्व करते हुए सामाजिक दायित्व निभाया। वर्ष 1980 का राज्यव्यापी गोकाक अभियान इसकी एक मिसाल है। इस अभियान के कारण ही तत्कालीन सरकार को प्रशासनिक कामकाज में कन्नड़ भाषा को वरीयता देने की घोषणा करनी पड़ी थी।
उन्होंने कहा कि जीवनपर्यंत डॉ. राजकुमार ने स्वयं को एक श्रमिक मानते हुए रंगभूमि की सेवा की। जब परिवार द्वारा फिल्म वितरण कंपनी की स्थापना की जा रही थी, तब डॉ. राजकुमार ने कंपनी को उनका नाम देने से साफ इनकार करते हुए कहा कि उनके नाम का उपयोग वाणिज्यिक हितों की पूर्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए। राज्य के प्रशंसकों के लिए वे राजकुमार हैं, इस नाम का परिवारिक लाभ के लिए कतई उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। डॉ. राजकुमार जीवन के अंतिम पड़ाव में किसी पर बोझ नहीं बनाना चाहते थे।
पुस्तक के लेखक साहित्यकार डॉ. बरगूरु रामचंद्रप्पा ने कहा कि केवल तीसरी कक्षा तक शिक्षा प्राप्त करने वाले डॉ. राजकुमार संदलवुड तथा कन्नड़ भाषा के वास्तविक रूप में कुलपति थे। सदियों में ऐसे एक ही महान व्यक्तित्व का जन्म होता है। डॉ. राजकुमार समाज में मेहनतकश वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे। ऐसा वर्ग आत्मिक तौर पर संतुष्ट रहता है।
अभिनेत्री तारा अनुराधा ने कहा कि उन्होंने राजकुमार के साथ वर्ष 1980 में एक फिल्म में काम किया था, इस फिल्म का 'वसंत मासा बंदागा माउ चिगरले बेकुÓ गीत काफी मशहूर हुआ था, जिसकी शूटिंग के दौरान राजकुमार ने उनसे वादा किया था कि वे इस गीत को उनकी (तारा अनुराधा) शादी में गाएंगे। 22 वर्ष बाद जब उनकी शादी हुई थी, तब इस वादे के अनुसार डॉ. राजकुमार ने उनको तथा उनके पति को उनके घर में आमंत्रित कर यह गीत गाया था।
Published on:
31 Dec 2018 05:01 pm
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