
बाल तपस्वियों के लिए हुआ एकासना का आयोजन
बेंगलूरु. जयनगर के राजस्थान जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में आचार्य देवेंद्रसागर सूरी की निश्रा में बाल तपस्वियों के लिए मॉर्डन एकसना का आयोजन किया गया। इसमें 5 से लेकर 18 वर्ष के आयु तक सभी बाल तपस्वियों ने हिस्सा लिया। प्रथम जाप कक्ष के भीतर परमात्मा के नामस्मरण पूर्वक बाल तपस्वियों को तप साधना के महिमा से अवगत करवाते हुए आचार्य ने कहा कि भगवान महावीर कहते हैं तप से आत्मा शुद्ध होती है, कषाय मिट जाते हैं। तप का अर्थ क्या है इसे समझना आवश्यक है। यदि हमें मक्खन से घी बनाना है तो सीधे ही उसे आंच पर नहीं रख देते। उसे किसी बर्तन में डालना होगा। यहां उद्देश्य बर्तन को तपाना नहीं है बल्कि मक्खन को तपाकर उसे शुद्ध करना है। इसी तरह आत्मा का शुद्धिकरण होता है। तपस्या का एक अर्थ है जहां इच्छाएं समाप्त हो जाए। हम लोग भूखे रहने की तपस्या तो काफी कर रहे हैं पर तपस्या के पीछे छिपे उद्देश्य को भूल रहे हैं। तप आध्यात्मिक जीवन की आधार-शिला है। तपस्वियों के जीवन की साधारण घटना भी आम आदमी के लिए आश्चर्य व कौतूहल का विषय बन जाता है। तपस्वी अपने जीवन की दशा स्वयं निर्धारित करते हैं, जबकि सामान्य व्यक्तियों का जीवन पूर्णत: परिस्थितियों के अधीन होता है। तपस्वी तप की ऊर्जा से परिस्थिति की प्रतिकूलता को भी अपने अनुकूल बना लेते हैं। वस्तुत: तप करना या तपश्चर्या एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसकी कुछ मर्यादाएं हैं। सनक में आकर कुछ भी करते रहने का नाम तप नहीं है। नमक न खाना, नंगे पांव चलना, भूखे रहना आदि क्रियाओं से शारीरिक कष्ट तो अवश्य होता है, किंतु कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं प्राप्त होता।
Published on:
03 Oct 2021 10:22 pm
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