
शाश्वत सुख का सीधा संबंध आत्मा से-डॉ. पद्मकीर्ति
बेंगलूरु. श्रीरंगपट्टनम के दिवाकर गुरु मिश्री दरबार में साध्वी डॉ. कुमुदलता आदि ठाणा का चातुर्मास निरंतर जारी है। सोमवार को साध्वी डॉ. पदमकीर्ति ने सुखविपाक के माध्यम से समझाते हुए कहा कि मनुष्य जन्म की सार्थकता तब ही होती है जब उसे शाश्वत सुख की प्राप्ति हो, अर्थात परम सुख की प्राप्ति। इस शाश्वत सुख का सीधा संबंध आत्मा से होता है। इसका संबंध न किसी व्यक्ति, परिस्थिति या घटना से नहीं होता है। भगवान महावीर ने कहा है कि अनन्त सुख सबकी आत्मा में होता है। जरूरत है उसे विकसित करने की। उसको हम जितना विकसित करते हुए जाएंगे उतना ही परम आनंद की प्राप्ति होती जाएगी। जिस सुख के पीछे किसी भी प्रकार का दु:ख नहीं होता है उसे ही सच्चे अर्थों में सच्चा सुख कहा जाता है। ये आत्मा का सुख ऐसा है कि एक बार मिल जाता है तो फिर कभी न तो परिवर्तित होता है और न ही कभी इसका अन्त होता है। यह हमेशा के लिए बना रहता है। आत्मिक सुख की तीन विशेषताएं बताई गई हैं। आत्मिक सुख स्थायी है। आत्मिक सुख स्वतन्त्र एवं शुद्ध है। आत्मिक सुख पुण्य पर आधारित नहीं होता है बल्कि इसे पुरुषार्थ के माध्यम से प्रकट किया जाता है। जैसे-जैसे हमारा पुरुषार्थ जागेगा उतने ही गुण हमारे भीतर प्रकट होगे। अर्थात आत्मिक गुणों का ईंधन सम्यक पुरूषार्थ है। एक गुण को प्रकट करने पर भी सुख मिलता है तो जिस दिन समस्त आत्मगुणों को प्रकट करने का पुरुषार्थ संपूर्ण रूप से सफल होगा। उस दिन जो सुख मिलेगा वह सच्चा सुख होगा। जिसे हम आत्मिक सुख, अनंत सुख या मोक्ष का सुख कहते हैं। गुरुभक्त वर्षावास समिति के मंत्री उम्मेद रांका ने बताया कि सोमवार को बेंगलूरु, मंड्या, मैसूरु के अतिरिक्त राज्य के अनेक शहरों से श्रद्धालु साध्वी वृन्द के दर्शन करने के लिए पहुंचे।
Published on:
10 Aug 2020 03:02 pm
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