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हर जीव परस्पर एक दूसरे का उपकारी

व्यक्ति को उपकारियों के उपकारों को न भूलते हुए कृतज्ञ बनना चाहिए

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हर जीव परस्पर एक दूसरे का उपकारी

बेंगलूरु. जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में जयधुरन्धर मुनि ने कहा कि हर जीव का परस्पर एक दूसरे पर उपकार रहता है। इसलिए जैन चिह्न के नीचे परस्परोपगृहों जीवानाम सूत्र अंकित किया जाता है। उन्होंने कहा कि परस्पर सहयोग के बगैर जीवन नहीं चल सकता। व्यक्ति दूसरों से सहयोग लेने के लिए तत्पर रहता है, परंतु जरूरत पडऩे पर अपने उपकारियों को सहयोग प्रदान करने में आगे नहीं आता। व्यक्ति को उपकारियों के उपकारों को न भूलते हुए कृतज्ञ बनना चाहिए। एक आदर्श श्रावक कृतघ्नी नहीं कृतज्ञ होता है। वफादारी का गुण पशु जगत में भी देखने को मिलता है। सभा में नंदिनीबाई खाबिया ने 29, प्रेमा पगारिया ने 6, संगीता छल्लाणी ने4 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए।


कर्मों को भोगे बिना जीव को मुक्ति नहीं
हनुमंतनगर जैन स्थानक में साध्वी सुमित्रा ने कहा कि आत्मा दो प्रकार के कर्म निकित और निकाचित का बंध करती है। कर्मों का भुगतान किए बिना, कर्मों को भोगे बिना जीव को मुक्ति नहीं मिलती है। कर्मों का फल साक्षात तीर्थंकर भगवान, चक्रवर्ती आदि बड़े महान पुरुषों को भी भोगना पड़ता है। उनके सामने संसारी तुच्छ प्राणियों की तो बिसात ही क्या है।

मौत की हवा का झोंका जब आएगा तो जिंदगी का वृक्ष उखड़ जाएगा। अत: सच्चा साधक वही है जो अपने समय का सदुपयोग धर्म की आराधना, सेवा, परोपकार में करके अनमोल मानव जीवन को सार्थक बनाए। साध्वी सुमित्रा ने सागरदत्त चरित्र का वाचन किया। आगामी 6 सितम्बर से होने वाले अष्ट दिवसीय पर्युषण महापर्व पर तपस्या जप करने का अधिकाधिक श्रद्धालुओं से आह्वान किया। राष्ट्र संत तरुण सागर के देवलोकगमन पर श्रद्धालुओं ने उन्हें श्रद्धांजलि भावांजलि दी। साध्वी सुप्रिया ने उनके गुणस्मरण किया। संचालन सहमंत्री रोशनलाल बाफना ने किया।

मलिन वृत्ति से होता है अपना ही बुरा
मैसूरु. सुमतिनाथ जैन संघ के महावीर भवन में जैनाचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि आग में ईंधन डालने से आग कभी शांत नही होती है बल्कि वह अधिकाधिक प्रज्ज्वलित होती जाती है। आग की शांति के लिए तो जल का ही आश्रय लेना पड़ता है। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार यदि आप वैर की आग को शांत करना चाहते हो तो आपको मैत्री का आश्रय लेना चाहिए। सचमुच इस जगत में अपना बुरा करने वाला कोई नहीं है। अपनी ही मलिन वृत्ति प्रवृत्तियों के कारण अपना बुरा होता है। अत: यदि अपना भला चाहते हो तो अपने मन को मैत्री, प्रमोद, करुणा एवं माध्यस्थ्य भावना से ओतप्रोत करने का प्रयास करो।